मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा
ग़ज़ल 14
नज़्म 1
अशआर 8
ऐ दिल तमाम नफ़अ' है सौदा-ए-इश्क़ में
इक जान का ज़ियाँ है सो ऐसा ज़ियाँ नहीं
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