aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
1840 - 1902
हर इक फ़िक़रे पे है झिड़की तो है हर बात पर गाली
तुम ऐसे ख़ूबसूरत हो के इतने बद-ज़बाँ क्यूँ हो
हिदायत शैख़ करते थे बहुत बहर-ए-नमाज़ अक्सर
जो पढ़ना भी पड़ी तो हम ने टाली बे-वज़ू बरसों
चार बोसे तो दिया कीजिए तनख़्वाह मुझे
एक बोसे पे मिरा ख़ाक गुज़ारा होगा
न लड़ाओ नज़र रक़ीबों से
काम अच्छा नहीं लड़ाई का
जो तेरे गुनह बख़्शेगा वाइ'ज़ वो मिरे भी
क्या तेरा ख़ुदा और है बंदे का ख़ुदा और
Dastoor-ul-Amal Maal
1864
Deewan-e-Sahar
1894
Deewan-e-Saher
1893
दीवान-ए-सेहर
सहर-ए-सामरी
1868
ख़ुलासत-उल-मंतिक़
मेयारूल बलाग़ात
Meyar-ul-Balagha
1906
Meyar-ul-Balagah
Meyar-ul-Balaghat
1866
Nazm-e-Parveen
1951
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