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नुसरत ग्वालियारी

1938 | दिल्ली, भारत

नुसरत ग्वालियारी

ग़ज़ल 8

शेर 22

भूल जाने का मुझे मशवरा देने वाले

याद ख़ुद को भी मैं आऊँ कुछ ऐसा कर दे

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रात के लम्हात ख़ूनी दास्ताँ लिखते रहे

सुब्ह के अख़बार में हालात बेहतर हो गए

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कुछ एहतियात परिंदे भी रखना भूल गए

कुछ इंतिक़ाम भी आँधी ने बदतरीन लिए

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मैं अजनबी हूँ मगर तुम कभी जो सोचोगे

कोई क़रीब का रिश्ता ज़रूर निकलेगा

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कुछ नौ-जवान शहर से आए हैं लौट कर

अब दाव पर लगी हुई इज़्ज़त है गाँव की

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पुस्तकें 2

 

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI