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पंडित जवाहर नाथ साक़ी

ग़ज़ल 37

शेर 26

अपने जुनूँ-कदे से निकलता ही अब नहीं

साक़ी जो मय-फ़रोश सर-ए-रहगुज़ार था

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उश्शाक़ जो तसव्वुर-ए-बर्ज़ख़ के हो गए

आती है दम-ब-दम ये उन्हीं को सदा-ए-क़ल्ब

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किया है चश्म-ए-मुरव्वत ने आज माइल-ए-मेहर

मैं उन की बज़्म से कल आबदीदा आया था

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रुबाई 7

ई-पुस्तक 1

कुल्लियात-ए-साक़ी

 

1926

 

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