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परवीन शाकिर के उद्धरण
मेरा गुनाह यह है कि मैं एक ऐसे क़बीले में पैदा हुई जहाँ सोच रखना जुर्म में शामिल है, मगर क़बीले वालों से भूल यह हुई कि उन्होंने मुझे पैदा होते ही ज़मीन में नहीं गाड़ा और अब मुझे दीवार में चुन देना इनके लिए अख़लाक़ी तौर पर इतना आसान नहीं रहा।
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