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Qamar Jalalabadi's Photo'

क़मर जलालाबादी

1917 - 2003 | पंजाब, पाकिस्तान

हिंदी फ़िल्म जगत के प्रसिद्ध गीतकारों में शामिल

हिंदी फ़िल्म जगत के प्रसिद्ध गीतकारों में शामिल

क़मर जलालाबादी का परिचय

मूल नाम : ओम प्रकाश भण्डारी

जन्म : 09 Mar 1917 | जलालाबाद, पंजाब

क़मर जलालाबादी (जन्म- 1919, जलालाबाद, अमृतसर; मृत्यु- 9 जनवरी, 2003) भारतीय हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध गीतकार और शाइर थे। वह चार दशकों तक हिन्दी फ़िल्म जगत को बतौर गीतकार एक से बढ़ कर एक गीत लिख कर प्रदान करते रहे। क़मर जलालाबादी द्वारा लिखे गए गीत आज भी भारत में बड़े पैमाने पर सुने जाते हैं। फ़िल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ का मस्ती भरा गीत “मेरा नाम चिन चिन चूँ” और “आइए मेहरबाँ बैठिए जान-ए-जाँ” कालजयी बन चुके हैं। क़मर जलालाबादी ने अपने लम्बे करियर में हिन्दी सिनेमा के लगभग सभी प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ कार्य किया। एक गीतकार के रूप में क़मर जलालाबादी ने बहुत सारे अविस्मरणीय गीत हिन्दी सिनेमा को दिए। बहुत कम गीतकार ऐसे होंगे, जिनके रचे गीत दशकों तक श्रोताओं के जीवन का अभिन्न अंग बन रहे हों।


क़मर जलालाबादी का जन्म वर्ष 1919 में ब्रिटिश कालीन भारत में अमृतसर के ‘जलालाबाद’ में हुआ था। इनके बहुत सारे गीतों में दर्शन समाहित रहा है। माता-पिता ने इनका नाम ‘ओमप्रकाश भण्डारी’ रखा था। क़मर जलालाबादी ने सात साल की बाल्यावस्था से ही उर्दू में शाइरी करना प्रारम्भ कर दिया था। घर से तो उन्हें किसी प्रकार का प्रोत्साहन नहीं मिलता था, पर एक घुमंतु शाइर अमर ने उनके अंदर छिपी शाइराना सलाहियतों को पहचान कर उन्हें प्रोत्साहित किया था। उन्होंने ही ओमप्रकाश भण्डारी को तख़ल्लुस ‘क़मर’ प्रदान किया, जिसका अर्थ होता है- ‘चाँद’। उस समय की परिपाटी के अनुसार चूँकि ओमप्रकाश जी जलालाबाद में रहते थे, अतः उनका शाइर के तौर पर नामकरण हो गया “क़मर जलालाबादी”

फ़िल्मों के प्रति आकर्षण क़मर जलालाबादी को चालीस के दशक के शुरू में पूना ले आया और 1942 में उन्हें ‘ज़मींदार’ फ़िल्म में गीत लिखने का मौक़ा मिल गया। फ़िल्म के गीत अच्छे चले और ख़ास तौर पर श्मशाद बेगम द्वारा गाया गया गीत “दुनिया में ग़रीबों को आराम नहीं मिलता”, अच्छा लोकप्रिय हुआ। बाद में वे बम्बई (वर्तमान मुम्बई) आ गए और अगले चार दशकों तक हिन्दी फ़िल्म जगत को बतौर गीतकार एक से बढ़ कर एक गीत लिख कर प्रदान करते रहे। यूँ तो उन्होंने फ़िल्म की कहानी की माँग के अनुसार हर तरह के गीत लिखे, परंतु उनके द्वारा रचे गये वियोग वाले प्रेमगीत अपना एक अलग ही स्थान रखते हैं। मानवीय भावनाओं को उन्होंने अपने गीतों में बहुत ख़ूबसूरती और गहराई से ढाला। उनके रचे गीत जीवन से एक गहरा जुड़ाव लिए हुए रहे।

फ़िल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ का यह मस्ती भरा गीत “मेरा नाम चिन चिन चूँ, रात चाँदनी मैं और तू” कालजयी बन चुका है। इसके निर्माण में संगीत निर्देशक ओ. पी. नय्यर, गायिका गीता दत्त, नर्तकी और अदाकारा हेलन, निर्देशक शक्ति सामंत, नृत्य निर्देशक सूर्य कुमार, सिनेमेटोग्राफ़र चंदू के अलावा गीतकार क़मर जलालाबादी का भी भरपूर योगदान था, जिन्होंने इस गीत में मस्ती भरा आलम लाने के लिये आवश्यक शब्दों का ऐसा ताना-बाना बुना कि यह सुनने वाले के कानों से उसके दिल में समा जाता है और उसे एक ख़ुशनुमा एहसास से भर देता है। परंतु बहुत सारे अन्य हिट गानों के साथ इस गीत के साथ भी यही दुखद बात जुड़ी रहती है कि इस गाने को दशकों से सुनने वाले भी बस इस गीत को ओ. पी. नय्यर और गीता दत्त के नामों के साथ जोड़ कर देखते हैं। बहुत कम ऐसे संगीत रसिक होंगे जो इस गीत को वाजिब शब्द देने वाले का नाम जानते होंगे या अगर नहीं जानते हैं तो जानने के लिये उत्सुक होंगे।
‘हावड़ा ब्रिज’ का दूसरा प्रसिद्ध गीत “आइए मेहरबाँ बैठिये जान-ए-जाँ, शौक़ से लीजिए जी, इश्क़ के इम्तिहाँ” के साथ भी यही होता आया है। इस मन लुभावने वाले गीत के साथ भी आशा भोंसले की मादक गायकी, मधुबाला के मोहक अभिनय और ओ. पी. नय्यर के कर्णप्रिय संगीत को जोड़ कर याद किया जाता है और बेहतरीन शब्दों का जाल बुनने वाला रचयिता पार्श्व में छिपा रह जाता है।
“इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा।” सन 1948 में बनी फ़िल्म ‘प्यार की जीत’ के इस गीत को यदि सुना जाए तो अधिकतर श्रोताओं को सिर्फ़ मोहम्मद रफ़ी की प्रसिद्ध गायकी का जुड़ाव इस गीत से सूझ पाता है और कुछ गम्भीर क़िस्म के संगीत रसिक इस जानकारी से आगे जाकर हुस्नलाल-भगतराम के नाम पर जा पहुँचते हैं, जिन्होंने इस गीत के लिए संगीत की रचना की थी। इस गीत के शब्द भी क़मर जलालाबादी जी की ही रचनात्मक लेखनी से उत्पन्न हुए थे।
क़मर जलालाबादी ने अपने समय के लगभग सभी गायक-गायिकाओं के साथ कार्य किया। उनके लिखे गीतों को हिन्दी सिनेमा के लगभग सभी मशहूर गायक-गायिकाओं, मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ, जी.एम दुर्रानी, ज़ीनत बेगम, मंजू, अमीरबाई कर्नाटकी, मोहम्मद रफ़ी, तलअत महमूद, गीता दत्त, सुरय्या, श्मशाद बेगम, मुकेश, मन्ना डे, आशा भोंसले, किशोर कुमार और स्वर-कोकिला लता मंगेशकर आदि ने गाया।

संगीत निर्देशकों द्वारा गायनः
क़मर जलालाबादी के लिखे गीतों को कुछ संगीत निर्देशकों ने स्वयं भी गाया। एस. डी. बर्मन ने 1946 में बनी ‘एट डेज़’ फ़िल्म के लिए एक कॉमिक गीत “ओ बाबू बाबू रे दिल को बचाना बचाना दिल का बनेगा निशाना…” अपनी आवाज़ में गाया। संगीत निर्देशक सरदार मलिक ने भी उनके लिखे कई गीत गाए और 1947 में बनी ‘रेणुका’ के एक गीत “सुनती नहीं दुनिया कभी फ़रियाद किसी की, दिल रोता रहा आती रही याद उसकी” ने लोकप्रियता हासिल की।

मलिका-ए-हुस्न अभिनेत्री नसीम बानो ने भी 1947 में बनी फ़िल्म ‘मुलाक़ात’ में एक ग़ज़ल “दिल किसलिए रोता है, प्यार की दुनिया में ऐसा ही होता है” को अपनी आवाज़ में गाया। मशहूर नृत्याँगना सितारा देवी ने भी 1944 में बनी फ़िल्म ‘चाँद’ में क़मर जलालाबादी के लिखे कुछ गीतों को गाया। ‘चाँद’ क़मर जलालाबादी की शुरुआती उल्लेखनीय फ़िल्मों में से एक है।
काम के बाद बचा हुआ वक़्त घर पर परिवार के साथ बिताना पसंद करने वाले क़मर जलालाबादी ने अपने लम्बे करियर में हिन्दी सिनेमा के लगभग सभी प्रसिद्ध संगीतकारों ग़ुलाम हैदर, जी. दामले, प. अमरनाथ, खेमचंद प्रकाश, हुस्नलाल भगतराम, एस. डी. बातिश, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सी. रामचंद्र, मदन मोहन, सुधीर फड़के, एस. डी. बर्मन, सरदार मलिक, रवि, अविनाश व्यास, ओ. पी. नय्यर, कल्याणजी आनंदजी, सोनिक ओमी, उत्तम सिंह और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि के साथ काम किया।

1954 में बनी फ़िल्म ‘पहली तारीख़’ के लिये क़मर जलालाबादी ने एक ऐसा गीत लिखा था, जो दशकों तक हर महीने की पहली तारीख़ को रेडियो सीलोन पर बजाया जाता था और शायद अब भी इस गीत को हर महीने की पहली तारीख़ को बजाया जाता हो। संसार के वेतनभोगी वर्ग के लिये ‘वेतन दिवस’ का बहुत बड़ा महत्व है और भारत के करोड़ों वेतन भोगियों से सीधा सम्बन्ध बनाता हुआ यह गीत उनकी ख़ुशी का इज़हार करता है। सुधीर फड़के के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने क़मर जलालाबादी के लिखे मस्ती भरे बोलों को मस्ती भरे अंदाज़ में गाकर इस गीत को अमर बना दिया।
क़मर जलालाबादी का निधन 9 जनवरी, 2003 को हुआ। उन्होंने भारतीय सिनेमा तथा जनता को ऐसे बेहतरीन गीत दिए, जिन्हें कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता।

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