aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
लब-ए-शीरीं से अगर हो न तेरा लब शीरीं
कोहकन तू भी तो अब दामन-ए-कोहसार न छोड़
मुझे ख़ुशी कि गिरफ़्तार मैं हुआ तेरा
तो शाद हो कि है ऐसा शिकार असीर मिरा
शैख़ मुझ को न डरा अपनी मुसलमानी थाम
हम फ़क़ीरों का किसी रंग से ईमान न जाए
बस नहीं चलता है वर्ना अपने मर जाने के साथ
फेंक देते खोद कर दुनिया की सब बुनियाद हम
नर्गिसी चश्म दिखा कर के वो वहशत-ज़दा यार
ये गया वो गया जिस तरह ग़ज़ाल आप से आप
दीवान-ए-क़ासिम अली ख़ान आफ़रीदी
1971
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