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क़ुर्बान अली सालिक बेग

1824 - 1880 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 35

शेर 6

तंग-दस्ती अगर हो 'सालिक'

तंदुरुस्ती हज़ार नेमत है

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अब तक भी मेरे होश ठिकाने नहीं हुए

'सालिक' का हाल रात को ऐसा सुना कि बस

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'सालिक' चखाऊँ उन को मज़ा जौर का अभी

डरता हूँ कुछ बुरा कहें सिन के दस मुझे

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पुस्तकें 3

Bahar-e-Salik

 

1871

कुल्लियात-ए-सालिक

 

1966

Kulliyat-e-Salik

 

1880

 

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