ग़ज़ल 22

नज़्म 1

 

शेर 4

इक घर बना के कितने झमेलों में फँस गए

कितना सुकून बे-सर-ओ-सामानियों में था

वक़्त ख़ुश ख़ुश काटने का मशवरा देते हुए

रो पड़ा वो आप मुझ को हौसला देते हुए

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सिमटती फैलती तन्हाई सोते जागते दर्द

वो अपने और मिरे दरमियान छोड़ गया

पुस्तकें 5

Doobte Badan Ka Hath

 

 

Guzre Waqton Ki Ibarat

 

1980

Guzre Waqton Ki Ibarat

 

1973

Intisab

 

1978

Urdu Mein Naat Goi

 

1990

 

ऑडियो 6

आँच आएगी न अंदर की ज़बाँ तक ऐ दिल

जो सैल-ए-दर्द उठा था वो जान छोड़ गया

निशान क़ाफ़ला-दर-क़ाफ़ला रहेगा मिरा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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