रिफ़अत सेठी
ग़ज़ल 6
अशआर 1
ज़िंदाँ से निकलने की ये तदबीर ग़लत है
ज़ंजीर के टुकड़े करो दीवार गिरा दो
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere