रुची दरोलिया
ग़ज़ल 14
नज़्म 7
अशआर 2
इश्क़ था दोनों को फ़ितरत मुख़्तलिफ़ थी
वो भटकता ही रहा और रुक गई मैं
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इश्क़ था दोनों को फ़ितरत मुख़्तलिफ़ थी
वो भटकता ही रहा और रुक गई मैं
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वो भटकता ही रहा और रुक गई मैं
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वो भटकता ही रहा और रुक गई मैं
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