साबिर आफ़ाक़
ग़ज़ल 10
नज़्म 1
अशआर 10
मुझ को लगता है घड़ी जिस ने बनाई होगी
इंतिज़ार उस को भी शिद्दत से किसी का होगा
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मुझ को लगता है घड़ी जिस ने बनाई होगी
इंतिज़ार उस को भी शिद्दत से किसी का होगा
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मौत आ जाए वबा में ये अलग बात मगर
हम तिरे हिज्र में नाग़ा तो नहीं कर सकते
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मौत आ जाए वबा में ये अलग बात मगर
हम तिरे हिज्र में नाग़ा तो नहीं कर सकते
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पूछ उस शख़्स से मैं जिस को नहीं मिल पाया
मैं तुझे जितना मयस्सर हूँ तिरी क़िस्मत है
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