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सालिम सलीम

1985 | दिल्ली, भारत

नई नस्ल के महत्वपूर्ण शायर।

नई नस्ल के महत्वपूर्ण शायर।

सालिम सलीम

ग़ज़ल 97

नज़्म 1

 

अशआर 54

अपने जैसी कोई तस्वीर बनानी थी मुझे

मिरे अंदर से सभी रंग तुम्हारे निकले

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भरे बाज़ार में बैठा हूँ लिए जिंस-ए-वजूद

शर्त ये है कि मिरी ख़ाक की क़ीमत दी जाए

चटख़ के टूट गई है तो बन गई आवाज़

जो मेरे सीने में इक रोज़ ख़ामुशी हुई थी

मैं घटता जा रहा हूँ अपने अंदर

तुम्हें इतना ज़ियादा कर लिया है

इक बर्फ़ सी जमी रहे दीवार-ओ-बाम पर

इक आग मेरे कमरे के अंदर लगी रहे

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नअत 1

 

पुस्तकें 246

वीडियो 12

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ऑडियो 8

कुछ भी नहीं है बाक़ी बाज़ार चल रहा है

काम हर रोज़ ये होता है किस आसानी से

दश्त की वीरानियों में ख़ेमा-ज़न होता हुआ

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