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शाह आसिम

ग़ज़ल 22

शेर 6

आईना ले के देख ज़रा अपने हुस्न को

आएगी ये बहार-ए-गुलिस्ताँ ख़िज़ाँ में याद

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इस्लाम और कुफ़्र हमारा ही नाम है

काबा कुनिश्त दोनों में अपना मक़ाम है

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देख कर मुझ को तुझे क्यूँ है तहय्युर नासेह

मशरब-ए-इश्क़ है ये मज़हब-ए-इस्लाम नहीं

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पुस्तकें 1

दीवान-ए-आसिम

 

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