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शाह आसिम

ग़ज़ल 22

शेर 4

इस्लाम और कुफ़्र हमारा ही नाम है

काबा कुनिश्त दोनों में अपना मक़ाम है

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काफ़िर-ए-इश्क़ हुआ जब से मैं इस दहर में हूँ

है मिरे कुफ़्र से ये दीन और ईमाँ नाज़ाँ

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देख कर मुझ को तुझे क्यूँ है तहय्युर नासेह

मशरब-ए-इश्क़ है ये मज़हब-ए-इस्लाम नहीं

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ई-पुस्तक 1

दीवान-ए-आसिम

 

1866

 

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