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शमशेर ख़ान

1984 | मुंबई, भारत

शमशेर ख़ान

ग़ज़ल 7

अशआर 9

मोहब्बत का तक़ाज़ा है ज़रा दूरी रखी जाए

बहुत नज़दीकियाँ अक्सर बड़ी तकलीफ़ देती हैं

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ये बात सच है तुम्हें ज़ुल्म में महारत है

ये बात भी तो हक़ीक़त है मैं नहीं डरता

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शायद तुम्हारी दीद मयस्सर हो कभी

आओ कि तुम को देख लें फ़ुर्सत से आज हम

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ये गर्दिश है ज़माने की मैं तुम से दूर हूँ लेकिन

मैं जितना दूर जाता हूँ तुम इतना याद आते हो

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तेरी कोशिश है चराग़ों को बुझा दे मेरे

मेरी हसरत है तिरे घर में उजाला जाए

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क़ितआ 1

 

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