Shariq Kaifi's Photo'

शारिक़ कैफ़ी

1961 | बरेली, भारत

ग़ज़ल 48

नज़्म 33

शेर 62

घर में ख़ुद को क़ैद तो मैं ने आज किया है

तब भी तन्हा था जब महफ़िल महफ़िल था मैं

वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीता

बिछड़ते वक़्त बताने की क्या ज़रूरत थी

झूट पर उस के भरोसा कर लिया

धूप इतनी थी कि साया कर लिया

पुस्तकें 4

अाम सा रद्द-ए-अमल

 

1989

अपने तमाशे का टिकट

 

2010

यहाँ तक रौशनी आती कहाँ थी

 

2008

 

चित्र शायरी 5

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं अब उसे ऐसे ही समझाता हूँ मैं कुछ हवा कुछ दिल धड़कने की सदा शोर में कुछ सुन नहीं पाता हूँ मैं बिन कहे आऊँगा जब भी आऊँगा मुंतज़िर आँखों से घबराता हूँ मैं याद आती है तिरी संजीदगी और फिर हँसता चला जाता हूँ मैं फ़ासला रख के भी क्या हासिल हुआ आज भी उस का ही कहलाता हूँ मैं छुप रहा हूँ आइने की आँख से थोड़ा थोड़ा रोज़ धुँदलाता हूँ मैं अपनी सारी शान खो देता है ज़ख़्म जब दवा करता नज़र आता हूँ मैं सच तो ये है मुस्तरद कर के उसे इक तरह से ख़ुद को झुटलाता हूँ मैं आज उस पर भी भटकना पड़ गया रोज़ जिस रस्ते से घर आता हूँ मैं

कहीं न था वो दरिया जिस का साहिल था मैं आँख खुली तो इक सहरा के मुक़ाबिल था मैं हासिल कर के तुझ को अब शर्मिंदा सा हूँ था इक वक़्त कि सच-मुच तेरे क़ाबिल था मैं किस एहसास-ए-जुर्म की सब करते हैं तवक़्क़ो' इक किरदार किया था जिस में क़ातिल था मैं कौन था वो जिस ने ये हाल किया है मेरा किस को इतनी आसानी से हासिल था मैं सारी तवज्जोह दुश्मन पर मरकूज़ थी मेरी अपनी तरफ़ से तो बिल्कुल ही ग़ाफ़िल था मैं जिन पर मैं थोड़ा सा भी आसान हुआ हूँ वही बता सकते हैं कितना मुश्किल था मैं नींद नहीं आती थी साज़िश के धड़के में फ़ातेह हो कर भी किस दर्जा बुज़दिल था मैं घर में ख़ुद को क़ैद तो मैं ने आज किया है तब भी तन्हा था जब महफ़िल महफ़िल था मैं

मुमकिन ही न थी ख़ुद से शनासाई यहाँ तक ले आया मुझे मेरा तमाशाई यहाँ तक रस्ता हो अगर याद तो घर लौट भी जाऊँ लाई थी किसी और की बीनाई यहाँ तक शायद तह-ए-दरिया में छुपा था कहीं सहरा मेरी ही नज़र देख नहीं पाई यहाँ तक महफ़िल में भी तन्हाई ने पीछा नहीं छोड़ा घर में न मिला मैं तो चली आई यहाँ तक सहरा है तो सहरा की तरह पेश भी आए आया है इसी शौक़ में सौदाई यहाँ तक इक खेल था और खेल में सोचा भी नहीं था जुड़ जाएगा मुझ से वो तमाशाई यहाँ तक ये उम्र है जो उस की ख़ता-वार है 'शारिक़' रहती ही नहीं बातों में सच्चाई यहाँ तक

 

वीडियो 13

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

शारिक़ कैफ़ी

Kisi ke samajhdar hone talak_Nazm by Shariq Kaifi

Shariq Kaifi, one of the leading Urdu poet from India reciting his ghazals at Mushaira at Delhi in 2014 organized by Rekhta.org - the largest website for Urdu poetry. शारिक़ कैफ़ी

Kuch qadam aur jism ko dhona hai yahan_Shariq kaifi

Shariq Kaifi, one of the leading Urdu poet from India reciting his ghazals at Mushaira at Delhi in 2014 organized by Rekhta.org - the largest website for Urdu poetry. शारिक़ कैफ़ी

Mahol banane wale jumle_Nazm by Shariq kaifi

Shariq Kaifi, one of the leading Urdu poet from India reciting his ghazals at Mushaira at Delhi in 2014 organized by Rekhta.org - the largest website for Urdu poetry. शारिक़ कैफ़ी

Shariq Kaifi reciting his Ghazal/Nazm at Mushaira (Shaam-e-Sher) by Rekhta.org-2014

Shariq Kaifi, one of the leading Urdu poet from India reciting his ghazals at Mushaira at Delhi in 2014 organized by Rekhta.org - the largest website for Urdu poetry. शारिक़ कैफ़ी

Tere gham se ubharna chahta hun_Shariq kaifi

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शारिक़ कैफ़ी

Shariq Kaifi is a famous Urdu poet from Bareily (U.P.). Watch him reciting his ghazal at Rekhta Studio. शारिक़ कैफ़ी

शारिक़ कैफ़ी..

Shariq Kaifi is a famous Urdu poet from Bareily (U.P.). Watch him reciting his ghazal at Rekhta Studio. शारिक़ कैफ़ी

कुछ क़दम और मुझे जिस्म को ढोना है यहाँ

शारिक़ कैफ़ी

निगाह नीची हुई है मेरी

शारिक़ कैफ़ी

ये चुपके चुपके न थमने वाली हँसी तो देखो

शारिक़ कैफ़ी

यूँ भी सहरा से हम को रग़बत है

शारिक़ कैफ़ी

हैं अब इस फ़िक्र में डूबे हुए हम

शारिक़ कैफ़ी

ऑडियो 18

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं

एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए

कहीं न था वो दरिया जिस का साहिल था मैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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