सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
ग़ज़ल 10
अशआर 1
नाम को भी न किसी आँख से आँसू निकला
शम्अ महफ़िल में जलाती रही परवाने को
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere