सय्यद ज़फ़र काशीपुरी
ग़ज़ल 11
अशआर 1
हम मुसलसल रहे गर्दिश की तहों के अंदर
इस जहाँ में न कोई दोस्त हमारा निकला
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere