तारिक़ नईम

ग़ज़ल 20

शेर 18

अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोए

शजर गिरा तो परिंदे तमाम शब रोए

अभी फिर रहा हूँ मैं आप-अपनी तलाश में

अभी मुझ से मेरा मिज़ाज ही नहीं मिल रहा

अब आसमान भी कम पड़ रहे हैं उस के लिए

क़दम ज़मीन पर रक्खा था जिस ने डरते हुए

खोल देते हैं पलट आने पे दरवाज़ा-ए-दिल

आने वाले का इरादा नहीं देखा जाता

रात रो रो के गुज़ारी है चराग़ों की तरह

तब कहीं हर्फ़ में तासीर नज़र आई है

पुस्तकें 1

दिये में जल्ती रात

 

2003

 

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