उफ़ुक़ लखनवी
ग़ज़ल 11
नज़्म 3
अशआर 2
जो मैं आप आप कहता हूँ हक़ारत वो समझते हैं
मिरी 'इज़्ज़त-फ़ज़ाई लफ़्ज़-ए-'तू' से होती रहती है
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere