वली काकोरवी
ग़ज़ल 35
अशआर 1
जो फिरी तो तेग़-ए-क़ज़ा बनी जो मिली तो आब-ए-बक़ा मिली
ये अजब तरह का कमाल है तिरी चश्म-ए-इश्वा-तराज़ में
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere