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ज़फ़र कमाली

1959 - - | सिवान, भारत

ज़फ़र कमाली

ग़ज़ल 2

 

शेर 4

निगाहों में जो मंज़र हो वही सब कुछ नहीं होता

बहुत कुछ और भी प्यारे पस-ए-दीवार होता है

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वही सुलूक ज़माने ने मेरे साथ किया

किया था जैसा मुशर्रफ़ ने बेनज़ीर के साथ

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शौहरों से बीबियाँ लड़ती हैं छापा-मार जंग

राब्ता उन का भी क्या कश्मीर की वादी से है

इस ज़माने की अजब तिश्ना-लबी है 'ज़फ़र'

प्यास उस की सिर्फ़ बुझती है हमारे ख़ून से

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