ज़हीर रहमती
ग़ज़ल 9
अशआर 10
जिस की कुछ ताबीर न हो
ख़्वाब उसी को कहते हैं
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जिस की कुछ ताबीर न हो
ख़्वाब उसी को कहते हैं
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सदियों में कोई एक मोहब्बत होती है
बाक़ी तो सब खेल तमाशा होता है
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सदियों में कोई एक मोहब्बत होती है
बाक़ी तो सब खेल तमाशा होता है
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और एहसास-ए-जिहालत बढ़ गया
किस क़दर पढ़ लिख के जाहिल हो गए
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