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ज़ेहरा निगाह

1937 - | पाकिस्तान

पाकिस्तान की अग्रणी शायरात में विख्यात।

ग़ज़ल

अपना हर अंदाज़ आँखों को तर-ओ-ताज़ा लगा

वहशत में भी मिन्नत-कश-ए-सहरा नहीं होते

नज़्म

''अलिफ़'' और ''बे'' के नाम

इंसाफ़

क़िस्सा गुल-बादशाह का

गुल-चाँदनी

डाकू

नया घर

पुल-सिरात

सुना है

समझौता

कहानी गुल-ज़मीना की

क़िस्सा गुल-बादशाह का

ज़ेहरा ने बहुत दिन से कुछ भी नहीं लिक्खा है

मुस्लिम मुस्लिम फ़सादात

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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