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ज़िया फ़ारूक़ी

1947 - 2024 | भोपाल, भारत

प्रसिद्ध उर्दू कवि और आलोचक, जो अपनी प्रभावशाली ग़ज़लों और साहित्यिक योगदान के लिए जाने जाते हैं

प्रसिद्ध उर्दू कवि और आलोचक, जो अपनी प्रभावशाली ग़ज़लों और साहित्यिक योगदान के लिए जाने जाते हैं

ज़िया फ़ारूक़ी

ग़ज़ल 36

नज़्म 5

 

अशआर 16

पहले था बहुत फ़ासला बाज़ार से घर का

अब एक ही कमरे में है बाज़ार भी घर भी

मत पूछिए क्या जीतने निकला था मैं घर से

ये देखिए क्या हार के लौटा हूँ सफ़र से

आँखें हैं कि अब तक उसी चौखट पे धरी हैं

देता हूँ ज़माने को मगर अपना पता और

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बदन की क़ैद से छूटा तो लोग पहचाने

तमाम 'उम्र किसी को मिरा पता मिला

शु’ऊर-ए-तिश्नगी इक रोज़ में पुख़्ता नहीं होता

मिरे होंटों ने सदियों कर्बला की ख़ाक चूमी है

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मनक़बत 1

 

पुस्तकें 10

 

वीडियो 6

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ऑडियो 5

अपने होने का हर इक लम्हा पता देती हुई

इश्क़ ने कर दिया क्या क्या सुख़न-आरा तिरे नाम

मैं जब भी तिरे शहर-ए-ख़ुश-ए-आसार से निकला

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