अमृतसर आज़ादी के बाद

कृष्ण चंदर

अमृतसर आज़ादी के बाद

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    पंद्रह अगस्त 1947-ई को हिन्दोस्तान आज़ाद हुआ। पाकिस्तान आज़ाद हुआ। पंद्रह अगस्त 1947-ई को हिन्दोस्तान भर में जश्न-ए-आज़ादी मनाया जा रहा था और कराची में आज़ाद पाकिस्तान के फ़र्हत-नाक नारे बुलंद हो रहे थे। पंद्रह अगस्त 1947-ई को लाहौर जल रहा था और अमृतसर में हिंदू मुस्लिम, सिक्ख अवाम फ़िर्क़ा-वाराना फ़साद की हौलनाक चपेट में चुके थे। क्योंकि किसी ने पंजाब की अवाम से नहीं पूछा था कि तुम अलग रहना चाहते हो या मिल-जुल कर, जैसा तुम सदीयों से रहते चले आए हो।

    सदीयों पहले मुतलक़-उल-इनानी का दौर-दौरा था और किसी ने अवाम से कभी ना पूछा था, फिर अंग्रेज़ों ने अपने सामराज की बुनियाद डाली और उन्होंने पंजाब से सिपाही और घोड़े अपनी फ़ौज में भर्ती किए और इसके इवज़ पंजाब को नहरें, पैंशनें अता फ़रमाईं लेकिन उन्होंने भी पंजाबी अवाम से ये सब कुछ पूछ के थोड़ी किया था।

    उसके बाद सयासी शऊर आया और सियासी शऊर के साथ जम्हूरियत आई और जम्हूरियत के साथ जम्हूरी सियास्तदान आए और सयासी जमातें आईं लेकिन फ़ैसला करते वक़्त उन्होंने पंजाबी अवाम से कुछ ना पूछा। एक नक़्शा सामने रख कर पंजाब की सर-ज़मीन के नोक-ए-क़लम से दो टुकड़े कर दीए। फ़ैसला करने वाले सियास्तदान गुजराती थे, कश्मीरी थे। इस लिए पंजाब के नक़्शे को सामने रखकर उस पर क़लम से एक लकीर, एक हद-ए-फ़ासिल क़ायम कर देना उनके लिए ज़्यादा मुश्किल ना था। नक़्शा एक निहायत ही मामूली सी चीज़ है। आठ आने, रुपय में पंजाब का नक़्शा मिलता है। उस पर लकीर खींच देना भी आसान है। एक काग़ज़ का टुकड़ा, एक रोशनाई की लकीर, वो कैसे पंजाब के दुख को समझ सकते थे। इस लकीर की माहीयत को जो इस नक़्शे को नहीं पंजाब के दिल को चीरती हुई चली जा रही थी।

    पंजाब के तीन मज़हब थे, लेकिन उसका दिल एक था। लिबास एक था, उस की ज़बान एक थी, उस के गीत एक थे। उसके खेत एक थे। उसके खेतों की रूमानी फ़िज़ा और उसके किसानों के पंचायती वलवले एक थे। पंजाब में वो सब बातें मौजूद थीं जो एक तहज़ीब, एक देस, एक क़ौमियत के वजूद का अहाता करती हैं, फिर किस लिए उस के गले पर छुरी चलाई गई? किस लिए उस की रगों में साल-हा-साल की नफ़रत का बीज बो दिया गया। किस लिए उस के खलियानों को शैतानियत और ज़ुल्म और मज़हबी आग से जलाया गया? हमें मालूम ना था। हमें बड़ा अफ़सोस है। हम इस ज़ुल्म की मज़म्मत करते हैं।

    ज़ुल्म और नफ़रत और मज़हबी जुनून को भड़काने वाले, पंजाब की वहदत को मिटा देने वाले आज मगरमच्छ के आँसू बहा रहे हैं और आज पंजाब के बेटे दिल्ली की गलीयों में और कराची के बाज़ारों में भीक मांग रहे हैं और उनकी औरतों की इस्मत लुट चुकी है और उनके खेत वीरान पड़े हैं। कहा जाता है कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान की हुकूमतों ने आज तक पंजाबी पनाह गज़ीनों के लिए बीस करोड़ रुपय सर्फ़ किए हैं यानी फ़ी कस बीस रुपय। बड़ा एहसान किया है। हमारी सात पुश्तों पर। अरे हम तो महीने में बीस रुपय की लस्सी पी जाते हैं और आज तुम उन लोगों को ख़ैरात देने चले हो जो कल तक हिन्दोस्तान के किसानों में सबसे ज़्यादा ख़ुश-हाल थे।

    जम्हूरियत के परसतारो ज़रा पंजाब के किसानों से, उसके तालिब-ए-इल्मों से, उसके खेत के मज़दूरों से, उसके दुकानदारों से, उसकी माओं, बेटों और बहुओं ही से पूछ तो लिया होता कि इस नक़्शे पर जो काली लकीर लग रही है इसके मुताल्लिक़ तुम्हारा क्या ख़्याल है? मगर वहां फ़िक्र किस को होती। किसी का अपना देस होता, किसी का अपना वतन होता, किसी की अपनी ज़बान होती, किसी के अपने गीत होते तो वो समझ सकता कि ये ग़लती क्या है और इस का ख़मयाज़ा किसे भुगतना पड़ेगा। ये दुख वही समझ सकता है जो हीर को राँझे से जुदा होते हुए देखे। जो सोहनी को महींवाल के फ़िराक़ में तड़पता देखे। जिसने पंजाब के खेतों में अपने हाथों से गेहूँ की सब्ज़ बालियाँ उगाई हों और उसके कपास के फूलों के नन्हे चाँदों को चमकता हुआ देखा हो। ये सियासत-दाँ क्या समझ सकते इस दुख को। जम्हूरियत के सियासत-दाँ थे ना।

    ख़ैर ये रोना मरना होता रहता है। इन्सान को इन्सान होने में बहुत देर है और फिर एक हेच-मदां अफ़्साना निगार को इन बातों से क्या। उसे ज़िंदगी से, सियासत से, इल्म-ओ-फ़न से, साईंस से, तारीख़-ओ-फ़लसफ़े से क्या लगाव। उसे क्या ग़रज़ कि पंजाब मरता है या जीता है। औरतों की अस्मतें बर्बाद होती हैं या महफ़ूज़ रहती हैं। बच्चों के गले पर छुरी फेरी जाती है या उन पर मेहरबान होंटों के बोसे सब्त होते हैं। उसे इन बातों से अलग हो कर कहानी सुनाना चाहिए। अपनी छोटी-मोटी कहानी जो लोगों के दिलों को ख़ुश कर सके। ये बड़े बोल उसे ज़ेब नहीं देते।

    ठीक तो कहते हैं आप, इस लिए अब अमृतसर की आज़ादी की कहानी सुनिए। इस शहर की कहानी जहां जलियाँवाला बाग़ है। जहां शुमाली हिंद की सबसे बड़ी तिजारती मंडी है। जहां सिक्खों का सबसे बड़ा मुक़द्दस गुरु-द्वारा है। जहां की क़ौमी तहरीकों में मुस्लमानों, हिंदूओं और सिक्खों ने एक दूसरे से बढ़-चढ़ के हिस्सा लिया। कहा जाता है कि लाहौर अगर फ़िरक़े-दारी का क़िला है तो अमृतसर क़ौमीयत का मर्कज़ है। इसी क़ौमीयत के सबसे बड़े मर्कज़ की दास्तान सुनिए।

    15 अगस्त 1947ई- को अमृतसर आज़ाद हुआ। पड़ोस में लाहौर जल रहा था मगर अमृतसर आज़ाद था और उसके मकानों, दुकानों बाज़ारों पर तिरंगे झंडे लहरा रहे थे, अमृतसर के क़ौम परस्त मुस्लमान इस जश्न-ए-आज़ादी में सबसे आगे थे, क्योंकि वो आज़ादी की तहरीक में सबसे आगे रहे थे। ये अमृतसर अकाली तहरीक ही का अमृतसर ना था ये अहरारी तहरीक का भी अमृतसर था। ये डाक्टर सत्य पाल का अमृतसर ना था ये कुचलो और हुसाम-उद्दीन का अमृतसर था, और आज अमृतसर आज़ाद था और उसकी क़ौम परवर फ़िज़ा में आज़ाद हिन्दोस्तान के नारे गूंज रहे थे और अमृतसर के मुस्लमान और हिंदू और सिक्ख यकजा ख़ुश थे।

    जलियाँवाला बाग़ के शहीद ज़िंदा हो गए। शाम को जब स्टेशन पर चिराग़ाँ हुआ तो आज़ाद हिन्दोस्तान और आज़ाद पाकिस्तान से दो स्पैशल गाड़ियाँ आईं। पाकिस्तान से आने वाली गाड़ी में हिंदू और सिक्ख थे। हिन्दोस्तान से आने वाली गाड़ी में मुस्लमान थे। तीन चार हज़ार अफ़राद उस गाड़ी में और इतने ही दूसरी गाड़ी में। कुल छः सात हज़ार अफ़राद। ब-मुश्किल दो हज़ार ज़िंदा होंगे बाक़ी लोग मरे पड़े थे और उनकी लाशें सर-बुरीदा थीं और उनके सर नेज़ों पर लगा के गाड़ियों की खिड़कियों में सजाये गए थे। पाकिस्तान स्पैशल पर उर्दू के मोटे मोटे हुरूफ़ में लिखा था, “क़त्ल करना पाकिस्तान से सीखो” हिन्दोस्तान स्पेशल में लिखा था हिन्दी में “बदला लेना हिन्दोस्तान से सीखो”

    इस पर हिंदुओं और सिक्खों को बड़ा तैश आया। ज़ालिमों ने हमारे भाईयों के साथ कितना बुरा सुलूक किया है। हाय ये हमारे हिंदू और सिक्ख पनाह-गुज़ीं और वाक़ई उनकी हालत भी क़ाबिल-ए-रहम थी। उन्हें फ़ौरन गाड़ी से निकाल कर पनाह-गुज़ीनों के कैंप में पहुंचाया गया और सिक्खों और हिंदूओं ने मुस्लमानों की गाड़ी पर धावा बोल दिया यानी अगर निहत्ते नीम मुर्दा मुहाजिरीन पर हमला को “धावा” कह सकते हैं तो वाक़ई ये धावा था। आधे से ज़्यादा आदमी मार डाले गए। तब कहीं जा कर मिल्ट्री ने हालात पर क़ाबू पाया।

    गाड़ी में एक बुढ़िया औरत बैठी थी और उसकी गोद में उसका नन्हा पोता था। रास्ते में उसका बेटा मारा गया उसकी बहू को जाट उठा कर ले गए थे उस के ख़ाविंद को लोगों ने भालों से टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। अब वो चुप-चाप बैठी थी। उसके लबों पर आहें ना थीं उसकी आँखों में आँसू ना थे। उसके दिल में दुआ ना थी। उसके ईमान में क़ुव्वत ना थी। वो पत्थर का बुत बनी चुप-चाप बैठी थी जैसे वो कुछ सुन ना सकती थी कुछ देख ना सकती थी कुछ महसूस ना कर सकती थी।

    बच्चे ने कहा, “दादी अम्माँ पानी।”

    दादी चुप रही। बच्चा चीख़ा, “दादी अम्माँ पानी।”

    दादी ने कहा, “बेटा पाकिस्तान आएगा तो पानी मिलेगा।”

    बच्चे ने कहा , “दादी अम्माँ क्या हिन्दोस्तान में पानी नहीं है?”

    दादी ने कहा, “बेटा अब हमारे देस में पानी नहीं है”

    बच्चे ने कहा, “क्यों नहीं है? मुझे प्यास लगी है। मैं तो पानी पियूँगा, पानी, पानी, पानी। दादी अम्माँ पानी पियूँगा। मैं पानी पियूँगा।”

    “पानी पियोगे?” एक अकाली रज़ाकार वहां से गुज़र रहा था उसने ख़शमगीं निगाहों से बच्चे की तरफ़ देख के कहा। “पानी पियोगे ना?”

    “हाँ...” बच्चे ने सर हिलाया।

    “नहीं नहीं” दादी ने ख़ौफ़ज़दा हो कर कहा। “ये कुछ नहीं कहता आपको, ये कुछ नहीं मांगता आपसे। ख़ुदा के लिए सरदार साहिब उसे छोड़ दीजिए। मेरे पास अब कुछ नहीं है।”

    अकाली रज़ाकार हंसा। उसने पाएदान से रिसते हुए ख़ून को अपनी ओक में जमा किया और उसे बच्चे के क़रीब ले जा के कहने लगा, “लो प्यास लगी है। तो ये पी लो बड़ा अच्छा ख़ून है मुस्लमान का ख़ून है।”

    दादी पीछे हट गई बच्चा रोने लगा। दादी ने बच्चे को अपने पीले दुपट्टे से ढक लिया और अकाली रज़ाकार हँसता हुआ आगे चला गया।

    दादी सोचने लगी कब ये गाड़ी चलेगी मेरे अल्लाह पाकिस्तान कब आएगा।

    एक हिंदू पानी का गिलास लेकर आया “लो पानी पिला दो उसे”

    लड़के ने अपनी बाँहें आगे बढ़ाईं, उस के होंट काँप रह थे उस की आँखें बाहर निकली पड़ी थीं। उसके जिस्म का रुआँ रुआँ पानी मांग रहा था। हिंदू ने गिलास ज़रा पीछे सरका लिया। बोला, “इस पानी की क़ीमत है मुस्लमान बच्चे को पानी मुफ़्त नहीं मिलता। इस गिलास की क़ीमत पच्चास रुपय है।”

    “पच्चास रुपय” दादी ने आजिज़ी से कहा। “बेटा मेरे पास तो चांदी का एक छल्ला भी नहीं है मैं पच्चास रुपय कहाँ से दूँगी

    “पानी, पानी, पानी पानी मुझे दो, पानी का गिलास मुझे दे दो, दादी अम्माँ देखो ये हमें पानी पीने नहीं देता।”

    “मुझे दो, मुझे दो” एक दूसरे मुसाफ़िर ने कहा “लो मेरे पास पच्चास रुपय हैं।”

    हिंदू हँसने लगा, “ये पच्चास रुपय तो बच्चे के लिए थे, तुम्हारे लिए इस गिलास की क़ीमत सौ रुपय है सौ रुपय दो और ये पानी का गिलास पी लो।”

    “अच्छा ये सौ रुपया ही ले लो, ये लो” दूसरे मुस्लमान मुसाफ़िर ने सौ रुपया अदा कर के गिलास ले लिया। और उसे गटा-गट पीने लगा।

    बच्चा उसे देखकर और भी चिल्लाने लगा “पानी, पानी, पानी दादी अम्माँ पानी।”

    “एक घूँट उसे भी दे दो, ख़ुदा और रसूल के लिए”

    मुस्लमान काफ़िर ने गिलास ख़ाली कर के अपनी आँखें बंद कर लीं, गिलास उस के हाथ से छूट कर फ़र्श पर जा गिरा और पानी की चंद बूँदें फ़र्श पर बिखर गईं। बच्चा गोद से उतर कर फ़र्श पर चला गया। पहले उसने ख़ाली गिलास को चाटने की कोशिश की, फिर फ़र्श पर गिरी चंद बूँदों को, फिर ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा, “दादी अम्माँ पानी, पानी”

    पानी मौजूद था और पानी नहीं था। हिंदू पनाह-गुज़ीं पानी पी रहे थे और मुस्लमान पनाह-गुज़ीं प्यासे थे। पानी मौजूद था और मटकों की क़तारें स्टेशन के प्लेटफार्म पर सजी हुई थीं और पानी के नल खुले थे और भंगी आब-ए-दस्त के लिए पानी हिंदू मुसाफ़िरों को दे रहे थे। लेकिन पानी नहीं था तो मुस्लमान मुहाजिरीन के लिए क्योंकि पंजाब के नक़्शे पर एक काली मौत की लकीर खींच गई थी और कल का भाई आज दुश्मन हो गया था और कल जिसको हमने बहन कहा था आज वो हमारे लिए तवायफ़ से भी बदतर थी और कल जो माँ थी आज बेटे ने उसको डायन समझ कर उस के गले पर छुरी फेर दी थी।

    पानी हिन्दोस्तान में था और पानी पाकिस्तान में भी था। लेकिन पानी कहीं नहीं था क्योंकि आँखों का पानी मर गया था और ये दोनों मुल्क नफ़रत के सहरा बन गए थे और उनकी तपती हुई रेत पर चलते हुए कारवाँ बाद-ए-सुमूम की बर्बादियों के शिकार हो गए थे। पानी था मगर सराब था। जिस देस में लस्सी और दूध पानी की तरह बहते थे, वहां आज पानी नहीं था और उसके बेटे प्यास से बिलक-बिलक कर मर रहे थे लेकिन दिल के दरिया सूख गए थे इस लिए पानी था और नहीं भी था।

    फिर आज़ादी की रात आई। दीवाली पर भी ऐसा चिराग़ां नहीं होता क्योंकि दीवाली पर तो सिर्फ दीए जलते हैं। यहां घरों के घर जल रहे थे। दीवाली पर आतिश-बाज़ी होती है, पटाख़े फूटते हैं। यहां बम फट रहे थे और मशीन गनें चल रही थीं। अंग्रेज़ों के राज में एक पिस्तौल भी भूले से कहीं नहीं मिलता था और आज़ादी की रात ना जाने कहाँ से इतने सारे बम, हैंड ग्रेनेड मशीन गन, स्टेन गन, ब्रेन गन टपक पड़े। ये असलाह जात बर्तानवी और अमरीकी कंपनियों के बनाए हुए थे और आज आज़ादी की रात हिन्दोस्तानियों और पाकिस्तानीयों के दिल छेद रहे थे। लड़े जाओ बहादुरो, मरे जाओ बहादुरो, हम असलाह जात तैयार करेंगे तुम लोग लड़ोगे शाबाश बहादुरो, देखना कहीं हमारे गोला बारूद के कारख़ानों का मुनाफ़ा कम ना हो जाये।

    घमसान का रन रहे तो मज़ा है। चीन वाले लड़ते हैं तो हिन्दोस्तान और पाकिस्तान वाले क्यों ना लड़ें। वो भी एशियाई हैं, तुम भी एशियाई हो। एशिया की इज़्ज़त बरक़रार रखो। लड़े जाओ बहादुरो, तुमने लड़ना बंद किया तो एशिया का रुख दूसरी तरफ़ पलट जाएगा और फिर हमारे कारख़ानों के मुनाफ़ा और हिस्से और हमारी सामराजी ख़ुशहाली ख़तरे में पड़ जाएगी। लड़े जाओ बहादुरो। पहले तुम हमारे मुल्कों से कपड़ा और शीशे का सामान और अत्रियात मंगाते थे, अब हम तुम्हें असलाह जात भेजेंगे और बम और हवाई जहाज़ और कारतूस। क्योंकि अब तुम आज़ाद हो गए हो। मुसल्लह हिंदू और सिक्ख रज़ाकार मुस्लमानों के घरों को आग लगा रहे थे और जय हिंद के नारे गूंज रहे थे। मुस्लमान अपने घरों की कमीं-गाहों में छिप कर हमला आवरों पर मशीनगनों से हमला कर रहे थे और हैंड ग्रेनेड फेंकते थे।

    आज़ादी की रात और उसके तीन चार रोज़ बाद तक इस तरह मुक़ाबला रहा। फिर सिक्खों और हिंदूओं की मदद के लिए आस-पास की रियास्तों से रज़ाकार पहुंच गए और मुस्लमानों ने अपने घर ख़ाली करने शुरू किए। घर, महल्ले, बाज़ार जल रहे थे। हिंदूओं के घर और मुस्लमानों के घर और सिक्खों के घर।

    लेकिन आख़िर में मुस्लमानों के घर सबसे ज़्यादा जले