मोना लिसा

MORE BYकुर्रतुलऐन हैदर

    स्टोरीलाइन

    इस कहानी में घटनाओं को कम और ज़ेहनी और दिली एहसासात को ज़्यादा बयान किया गया है। उन एहसासात में मिलन है, प्यार है और जुदाई है। समय-समय पर कई किरदार उभरते और धुँधले पड़ते है। हर किसी की अपनी कहानी है। मगर जो कहानी कहता है उसकी खुद की कहानी कहीं धुँधली पड़ जाती है।

    परियों की सर-ज़मीन को एक रास्ता जाता है शाह बलूत और सनोबर के जंगलों में से गुज़रता हुआ जहाँ रुपहली नद्दियों के किनारे चेरी और बादाम के सायों में ख़ूबसूरत चरवाहे छोटी-छोटी बाँसुरियों पर ख़्वाबों के नग़्मे अलापते हैं। ये सुनहरे चाँद की वादी है। Never Never।and के मग़रूर और ख़ूबसूरत शहज़ादे। पीटर पैन का मुल्क जहाँ हमेशा सारी बातें अच्छी-अच्छी हुआ करती हैं। आइसक्रीम की बर्फ़ पड़ती है। चॉकलेट और प्लम केक के मकानों में रहा जाता है। मोटरें पैट्रोल के बजाए चाय से चलती हैं। बग़ैर पढ़े डिग्रियाँ मिल जाती हैं।

    और कहानियों के इस मुल्क को जाने वाले रास्ते के किनारे-किनारे बहुत से साइन पोस्ट खड़े हैं जिन पर लिखा है, “सिर्फ़ मोटरों के लिए”

    “ये आम रास्ता नहीं”, और शाम के अँधरे में ज़न्नाटे से आती हुई कारों की तेज़ रौशनी में नर्गिस के फूलों की छोटी सी पहाड़ी में से झाँकते हुए ये अल्फ़ाज़ जगमगा उठते हैं, “प्लीज़ आहिस्ता चलाइए... शुक्रिया!”

    और बहार की शगुफ़्ता और रौशन दोपहरों में सुनहरे बालों वाली कर्ली लौक्स, सिंड्रेला और स्नो-वाईट छोटी-छोटी फूलों की टोकरियाँ लेकर इस रास्ते पर चेरी के शगूफ़े और सितारा-ए-सहरी की कलियाँ जमा’ करने आया करती थीं।

    एक रोज़ क्या हुआ कि एक इंतिहाई डैशिंग शह-सवार रास्ता भूल कर सनोबरों की इस वादी में निकला जो दूर-दराज़ की सर-ज़मीनों से बड़े-बड़े अज़ीमुश्शान मार्के सर करके चला रहा था। उसने अपने शानदार घोड़े पर से झुक कर कहा, “माई डियर यंग लेडी कैसी ख़ुश-गवार सुब्ह है!” कर्ली लौक्स ने बे-तअ’ल्लुक़ी से जवाब दिया, “अच्छा, वाक़ई’? तो फिर क्या हुआ?”

    शह-सवार की ख़्वाब-नाक आँखों ने ख़ामोशी से कहा, “पसंद करो हमें।”, कर्ली लौक्स की बड़ी-बड़ी रौशन और नीली आँखों में बे-नियाज़ी झिलमिला उठी।

    “जनाब-ए-आली हम बिल्कुल नोटिस नहीं लेते।” शह-सवार ने अपनी ख़ुसूसियात बताएँ। एक शानदार सी इम्पीरियल सर्विस के मुक़ाबले में टॉप किया है। अब तक एक सौ पैंतीस ड्यूल लड़ चुका हूँ। बेहतरीन क़िस्म का Heart Breaker हूँ। कर्ली लौक्स ने ग़ुस्से से अपनी सुनहरी लटें झटक दीं और अपने बादामी नाख़ुनों के बरगंडी क्योटेक्स को ग़ौर से देखने में मसरूफ़ हो गई। सिंड्रेला और स्नो-वाईट पगडंडी के किनारे स्ट्राबरी चुनती रहीं। और डैशिंग शह-सवार ने बड़े ड्रामाई अंदाज़ से झुक कर नर्सरी का एक पुराना गीत याद दिलाया

    कर्ली लौक्स कर्ली लौक्स

    या’नी मेरी प्यारी चीनी की गुड़िया

    तुम्हें बर्तन साफ़ करने नहीं पड़ेंगे

    और बतखों को लेकर चरागाह में जाना नहीं होगा

    बल्कि तुम कुशनों पर बैठी-बैठी स्ट्राबरी खाया करोगी

    मेरी सुनहरे घुँघरीले बालों वाली मग़रूर शहज़ादी एमीलिया हैनरी एटामराया... दो नैना मितवा रे तुम्हारे हम पर ज़ुल्म करें।

    और फिर वो डैशिंग शह-सवार अपने शानदार घोड़े को एड़ लगा कर दूसरी सर-ज़मीनों की तरफ़ निकल गया जहाँ और भी ज़ियादा अज़ीमुश्शान और ज़बरदस्त मार्के उसके मुंतज़िर थे और इसके घोड़े की टापों की आवाज़-ए-बाज़गश्त पहाड़ी रास्तों और वादियों में गूँजती रही।

    फिर एक और बात हुई जिसकी वज्ह से चाँद की वादी के बासी ग़मगीं रहने लगे क्योंकि एक ख़ुश-गवार सुब्ह मा’सूम कूक रोबिन सितारा-ए-सहरी के सब्ज़े पर मक़्तूल पाया गया। मरहूम पर किसी ज़ालिम ने तीर चलाया था। सिंड्रेला रोने लगी।

    बेचारा मेरा सुर्ख़ और नीले परों वाला गुड्डू सा परिंदा। परिस्तान की सारी चिड़ियों, ख़रगोशों और गिलहरियों ने मुकम्मल तहक़ीक़-ओ-तफ़तीश के बा’द पता चला लिया और बिल-इत्तिफ़ाक़ राय उसकी बे-वक़्त और जवाँ-मर्गी पर ताज़ियत की क़रार दाद मंज़ूर की गई। यूनीवर्सिटी में कूक रोबिन डे मनाया गया लेकिन अ’क़्ल-मंद पूसीकैट ने, जो फ़ुल बूट पहन कर मल्लिका से मिलने लंदन जाया करती थी, सिंड्रेला से कहा, “रोओ मत मेरी गुड़िया, ये कूक रोबिन तो यूँही मरा करता है और फिर फर्स्ट ऐड मिलते ही फ़ौरन ज़िंदा हो जाता है।”, और कूक रोबिन सचमुच ज़िंदा हो गया और फिर सब हँसी ख़ुशी रहने लगे।

    और हमेशा की तरह वादी के सब्ज़े पर बिखरे हुए भेड़ों के गले की नन्ही-मुन्नी घंटियाँ और दूर समंदर के किनारे शफ़क़ में खोए हुए पुराने इ’बादत-ख़ानों के घंटे आहिस्ता-आहिस्ता बजते रहे... डिंग-डोंग, डिंग-डोंग बेल, पूसी इन वेल।

    डिंग डोंग। डिंग डोंग... जैसे कर्ली लौक्स कह रही हो, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं।

    और उसने कहा। नहीं नहीं। ये तो परियों के मुल्क की बातें थीं। मैं कूक रोबिन नहीं हूँ, आप कर्ली लौक्स या सिंड्रेला हैं। नामों की टोकरी में से जो पर्ची मेरे हाथ पड़ी है उस पर रैट बटलर लिखा है लिहाज़ा आपको स्कार्ट ओहारा होना चाहिए। वर्ना अगर आप जूलियट या क्लिओपेट्रा हैं तो रोमियो या एंतोनी साहब को तलाश फ़तमाइए और मैं क़ाएदे से मिस ओहारा की फ़िक्र करूँगा। लेकिन वाक़िआ’ ये है कि आप जूलियट या बीटर्स या मारी एंतोनी नहीं हैं और मैं क़तई’ रैट बटलर नहीं हो सकता, काश आप महज़ आप होतीं और मैं सिर्फ़ मैं। लेकिन ऐसा नहीं है। लिहाज़ा आइए अपनी अपनी तलाश शुरू’ करें।

    हम सब के रास्ते यूँही एक दूसरे को काटते हुए फिर अलग-अलग चले जाते हैं, लेकिन परिस्तान की तरफ़ तो इनमें से कोई रास्ता भी नहीं जाता।

    चौकोबार्ज़ की स्टालों और लक्की डिप के खे़मे के रंगीन धारीदार पर्दों के पीछे चाँदी की नन्ही-मुन्नी घंटियाँ बजती रहीं। डिंग डोंग डिंग डोंग... पूसी बेचारी कुँवें में गिर गई और टॉम स्ट्राट बे-फ़िक्री से चौकोबार्ज़ खाता रहा। फिर वो सब ज़िंदगी की ट्रेजडी में ग़ौर करने में मसरूफ़ हो गए क्योंकि वो चाँद की वादी के बासी नहीं थे लेकिन इतने अहमक़ थे कि परिस्तान की पगडंडी पर मौसम-ए-गुल के पहले सफ़ेद शगूफ़े तलाश करने की कोशिश कर लिया करते थे और इस कोशिश में उन्हें हमेशा किसी किसी अजनबी साहिल, किसी किसी अनदेखी, अनजानी चट्टान पर फ़ोर्स्ड लैंडिंग करनी पड़ती थी।

    वो कई थे। डक डिंगटन जिसे उम्मीद थी कि कभी कभी तो उसे फ़ुल बूट पहनने वाली वो पूसीकैट मिल ही जाएगी जो उसे ख़्वाबों के शहर की तरफ़ अपने साथ ले जाए और उसे यक़ीन था कि ख़्वाबों के शहर में एक नीली आँखों वाली एलिस अपने ड्राइंगरूम के आतिश-दान के सामने बैठी उसकी राह देख रही है और वो अफ़्साना-निगार जो सोचता था कि किसी रूपहले राज-हंस के परों पर बैठ कर अगर वो ज़िंदगी के इस पार कहानियों की सर-ज़मीन में पहुँच जाए जहाँ चाँद के क़िले में ख़यालों की शहज़ादी रहती है तो वो उससे कहे, “मेरी मग़रूर शहज़ादी मैंने तुम्हारे लिए इतनी कहानियाँ, इतने ओपेरा और इतनी नज़्में लिखी हैं। मेरे साथ दुनिया को चलो तो दुनिया कितनी ख़ूबसूरत, ज़िंदा रहने और मुहब्बत करने के काबिल जगह बन जाए।”

    लेकिन रूपहला राजहँस उसे कहीं मिलता था और वो अपने बाग़ में बैठा-बैठा कहानियाँ और नज़्में लिखा करता था और जो ख़ूबसूरत और अ’क़्ल-मंद लड़की उससे मिलती,, उसे एक लम्हे के लिए यक़ीन हो जाता कि ख़यालों की शहज़ादी चाँद के ऐवानों में से निकल आई है लेकिन दूसरे लम्हे ये अ’क़्ल-मंद लड़की हँसकर कहती कि उफ़्फ़ुह भई फ़नकार साहब किया cynicism भी इस क़दर अल्ट्रा फ़ैशनेबल चीज़ बन गई है और आपको ये मुग़ालता कब से हो गया है कि आप जीनियस भी हैं और उसके नुक़रई क़हक़हे के साथ चाँद की किरनों की वो सारी सीढ़ियाँ टूट कर गिर पड़तीं जिनके ज़रिए वो अपनी नज़्मों में ख़यालिस्तान के महलों तक पहुँचने की कोशिश किया करता था और दुनिया वैसी की वैसी ही रहती। अँधेरी, ठंडी और बदसूरत... और सिंड्रेला जो हमेशा अपना एक बिलौरीं सैंडिल रात के इख़्तिताम पर ख़्वाबों की झिलमिलाती रक़्स-गाह में भूल आती थी, और वो डैशिंग शह-सवार जो परिस्तान की ख़ामोश, शफ़क़ के रंगों में खोई हुई पगडंडियों पर अकेले-अकेले ही टहला करता था और बर्फ़ जैसे रंग और सुर्ख़ अंगारा जैसे होंटों वाली स्नो-वाईट जो रक़्स करती थी तो बूढ़े बा’दशाह कोल के दरबार के तीनों परीज़ाद मुग़न्नी अपने वाइलन बजाना भूल जाते थे।

    “और”, रैट बटलर ने उससे कहा, “मिस ओहारा आपको कौन सा रक़्स ज़ियादा पसंद है। टैंगो... फ़ौक्स ट्रोट... रूंबा... आइए लैमबथ वाक करें।'

    और अफ़रोज़ अपने पार्टनर के साथ रक़्स में मसरूफ़ हो गई, हालाँकि वो जानती थी कि वो स्कारलेट ओहारा नहीं है क्योंकि वो चाँद की दुनिया की बासी नहीं थी। सब्ज़े पर रक़्स हो रहा था। रविश की दूसरी तरफ़ एक दरख़्त के नीचे, लकड़ी के आरिज़ी प्लेटफार्म पर चार्ल्स जोडा का ऑर्केस्ट्रा अपनी पूरी स्विंग में तेज़ी से बज रहा था... और फिर एकदम से कुत्ते के दूसरे किनारे पर ईस्तादा लाऊड स्पीकर मैं कारमन मिरांडा का रिकार्ड चीख़ने लगा, “तुम आज की रात किसी के बाज़ुओं में होना चाहती हो?” लक्की डिप और “आरिज़ी काफ़ी हाऊस” के रंगीन ख़ेमों पर बंधी हुई छोटी-छोटी घंटियाँ हवा के झोंकों के साथ बजती रहें और किसी ने उसके दिल में आहिस्ता-आहिस्ता कहा, मौसीक़ी... दीवानगी... ज़िंदगी... दीवानगी... शोपाँ के नग़्मे... “जिप्सी मून।” और ख़ुदा।

    उसने अपने हम-रक़्स के मज़बूत, पर ए’तिमाद, मग़रूर बाज़ुओं पर अपना बोझ डाल कर नाच के एक कुइक-स्टेप का टर्न लेते हुए उसके शानों पर देखा। सब्ज़े पर उस जैसे कितने इंसान उसकी तरह दो-दो के रक़्स की टुकड़ियों में मुंतशिर थे। “जूलियट” और “रोमियो”, “विक्टोरिया” और “एल्बर्ट”, “बीटर्स” और “दांते” एक दूसरे को ख़ूबसूरत धोके देने की कोशिश करते हुए, एक दूसरे को ग़लत समझते हुए अपनी इस मस्नूई’, आरिज़ी, चाँद की वादी में कितने ख़ुश थे वो सब के सब... बहार के पहले शगूफ़ों की मुतलाशी और काग़ज़ी कलियों पर क़ाने और मुतमइन... ज़िंदगी के तआ’क़ुब में परेशान-ओ-सरगर्दां ज़िंदगी... हुँह... शोपाँ की मौसीक़ी, सफ़ेद गुलाब के फूल, और अच्छी किताबें। काश ज़िंदगी में सिर्फ़ यही होता।

    चाँद की वादी के उस अफ़्साना-निगार अवीनाश ने एक मर्तबा उससे कहा था। हुँह... कितना बनते हो अवीनाश अभी सामने से एक ख़ूबसूरत लड़की गुज़र जाए और तुम अपनी सारी तख़य्युल परस्तियाँ भूल कर सोचने लगोगे कि उसके बग़ैर तुम्हारी ज़िंदगी में कितनी बड़ी कमी है... और अवीनाश ने कहा था, काश जो हम सोचते वही हुआ करता, जो हम चाहते वही मिलता... हाय ये ज़िंदगी का लक्की डिप... ज़िंदगी, जिसका जवाब मोनालीज़ा का तबस्सुम है जिसमें नर्सरी के ख़ूबसूरत गीत और चाँद सितारे तुर्शती हुई कहानियाँ तुम्हारा मज़ाक़ उड़ाती, तुम्हारा मुँह चिढ़ाती बहुत पीछे रह जाती हैं, जहाँ कूक रोबिन फिर से ज़िंदा होने के लिए रोज़ नए-नए तीरों से मरता रहता है... और कर्ली लौक्स रेशमीं कुशनों के अंबार पर कभी नहीं चढ़ पाती। काश अफ़रोज़ तुम और फिर वो ख़ामोश हो गया था क्योंकि उसे याद गया था कि अफ़रोज़ को “काश...”, इस सस्ते और जज़्बाती लफ़्ज़ से सख़्त चिड़ है। इस लफ़्ज़ से ज़ाहिर होता है जैसे तुम्हें ख़ुद पर ए’तिमाद, भरोसा, यक़ीन नहीं।

    और अफ़रोज़ लैमबेथ वाक की उछल कूद से थक गई। कैसा बे-हूदा सा नाच है। किस क़दर बे-मा’नी और फ़ुज़ूल से Steps हैं। बस उछलते और घूमते फिर रहे हैं, बेवक़ूफ़ों की तरह।

    “मिस ओहारा...”, उसके हम-रक़्स ने कुछ कहना शुरू’ किया।

    “अफ़रोज़ सुल्ताना कहिए।”

    “ओह... मिस अफ़रोज़ हमीद अली... आइए कहीं बैठ जाएँ।”

    “बैठ कर क्या करें?”

    “अर... बातें!”

    “बातें आप कर ही क्या सकते हैं सिवाए इसके कि मिस हमीद अली आप ये हैं, आप वो हैं, आप बेहद उ’म्दा रक़्स करती हैं, आपने कल के सिंगल्ज़ में प्रकाश को ख़ूब हराया...।”

    “उर... ग़ालिबन आपको सियास्यात से...।”

    “शुक्रिया, अवीनाश इसके लिए ज़रूरत से ज़ियादा है।”

    “अच्छा तो फिर मौसीक़ी या पालमणि की नई फ़िल्म...।”

    “मुख़्तसर ये कि आप ख़ामोश किसी तरह नहीं बैठ सकते...”, वो चुप हो गया।

    फिर शाम का अँधेरा छाने लगा। दरख़्तों में रंग बिरंगे बर्क़ी क़ुमक़ुमे झिलमला उठे और वो सब-सब्ज़े को ख़ामोश और सुनसान छोड़ के बाल-रुम के अंदर चले गए। ऑर्केस्ट्रा की गति तब्दील हो गई। जाज़ अपनी पूरी तेज़ी से बजने लगा। वो हॉल के सिरे पर शीशे के लंबे-लंबे दरीचों के पास बैठ गई।

    उसके क़रीब उसकी मुमानी का छोटा भाई, जो कुछ अ’र्से क़ब्ल अमरीका से वापिस आया था, मेरी वुड से बातें करने में मशग़ूल था और बहुत सी लड़कियाँ अपनी सब्ज़ बेद की कुर्सियाँ उसके आस-पास खींच कर इंतिहाई इन्हिमाक और दिलचस्पी से बातें सुन रही थीं और मेरीवुड हँसे जा रही थी। मेरीवुड, जो साँवली रंगत की बड़ी-बड़ी आँखों वाली एक आला ख़ानदान ईसाई लड़की और अंग्रेज़ कर्नल की बीवी थी, एक हिन्दुस्तानी फ़िल्म में क्लासिकल रक़्स कर चुकी थी और अब जाज़ की मौसीक़ी और शेरी के गिलासों के सहारे अपनी शामें गुज़ार रही थी।

    और पाइपों और सिगरटों के धुएँ का मिला-जुला लरज़ता हुआ अ’क्स बाल-रुम की सब्ज़ रोग़नी दीवारों पर बने हुए ताइरों, पाम के दरख़्तों और रक़्साँ अप्सराओं के धुँदले-धुँदले नुक़ूश को अपनी लहरों में लपेटता, नाचता, रंगीन और रौशन छत की बुलंदी की तरफ़ उठता रहा। ख़्वाबों का शबनम-आलूद सेहर आहिस्ता-आहिस्ता नीचे उतर रहा था।

    और यक-लख़्त, मेरी वुड ने ज़ोर से हँसना और चिल्लाना शुरू’ कर दिया। अफ़रोज़ की मुमानी के हॉलीवुड पलट भाई ने ज़रा घबरा कर अपनी कुर्सी पीछे को सरका ली। सब उसकी तरफ़ देखने लगे। ऑर्केस्ट्रा के सुर आहिस्ता-आहिस्ता डूबते गए और दबी-दबी और मद्धम क़हक़हों की आवाज़ें उभरने लगीं। वो सब्ज़ आँखों वाली ज़र्द-रू लड़की, जो बहुत देर से एक हिन्दुस्तानी प्रिंस के साथ नाच रही थी, थक कर अफ़रोज़ के क़रीब आकर बैठ गई और उसका बाप, जो एक हिन्दुस्तानी रियासत की फ़ौज का अफ़सर आला था, फ़िरन के पत्तों के पीछे गैलरी में बैठा इत्मीनान से सिगार का धुआँ उड़ाता रहा।

    फिर खेल शुरू’ हुए और एक बेहद ऊटपटांग से खेल में हिस्सा लेने के लिए सब दुबारा हॉल की फ़्लोर पर गए और अफ़रोज़ का हम-रक़्स रैट बटलर अपने ख़्वाब-नाक आँखों वाले दोस्त के साथ उसके क़रीब आया, मिस हमीद अली आप मेरी पार्टनर हैं न?”

    “जी हाँ... आइए।”

    और इस ख़्वाब-नाक आँखों वाले दोस्त ने कहा, “बारह बजने वाले हैं। नया साल मुबारक हो। लेकिन आज इतनी ख़ामोश क्यों हैं आप?

    “आपको भी मुबारक हो लेकिन ज़रूरत है कि इस ज़बरदस्त ख़ुशी में ख़्वाह-मख़ाह की बेकार बातों का सिलसिला रात-भर ख़त्म ही किया जाए।”

    “लेकिन मैं तो चाहता हूँ कि आप इस तरह ख़ामोश रहें। इससे ख़्वाह-मख़ाह ये ज़ाहिर होगा कि आपको इस मजमे में एक मख़सूस शख़्स की मौजूदगी नागवार गुज़र रही है।”

    “पर जो आप चाहें, लाज़िम तो नहीं कि दूसरों की भी वही मर्ज़ी हो। क्योंकि जब आप कुछ कहते होते हैं उस वक़्त आपको यक़ीन होता है कि सारी दुनिया बेहद दिलचस्पी से आपकी तरफ़ मुतवजजेह है”, और बा’द में लड़कियाँ कहती हैं, उफ़्फ़ुह! किस क़दर मज़े की बातें करते हैं अनवर साहब

    इतने में प्रकाश काग़ज़ और पैंसिलें तक़सीम करती हुई उनकी तरफ़ आई और उनको उनके फ़र्ज़ी नाम बताती हुई आगे बढ़ गई। थोड़ी देर के लिए सब चुप हो गए। फिर क़हक़हों के शोर के साथ खेल शुरू’ हुआ। खेल के दौरान में उसने अपनी ख़्वाब-नाक आँखें उठा कर यूँही कुछ कुछ बोलने की ग़रज़ से पूछा, “जी, तो हम क्या बातें कर रहे थे?

    “मेरा ख़याल है कि हम बातें क़तई’ कर ही नहीं रहे थे। क्यों आप क़ाएदे से अपनी पार्टनर के साथ जा कर खेलिए। आपको मा’लूम है कि मैं स्कार्लेट ओहारा हूँ। जो लेट अभी आपको तलाश कर रही थी।”, फिर डाक्टर मोहरा और अवीनाश उसकी तरफ़ गए और वो उनके साथ खेल में मसरूफ़ हो गई।

    और जब रात के इख़्तिताम पर वो रिफ़अ’त के साथ अपना ओवर कोट लेने के लिए क्लोक रुम की तरफ़ जा रही थी तो गैलरी के सामने की तरफ़ से गुज़रते हुए उसने इस सब्ज़ आँखों वाली ज़र्द-रू जूलियट के बाप को अपने दोस्तों से कहते सुना, “आप मेरे दामाद मेजर भंडारी से मिले? मुझे तो फ़ख़्र है कि मेरी बड़ी लड़की ने अपने फ़िरक़े से बाहर शादी करने में ज़ात और मज़हब की दक़यानूसी क़ुयूद की परवाह नहीं की। मेरी लड़की का इंतिख़्वाब पसंद आया आपको? ही ही ही। दर-अस्ल मैंने अपनी चारों लड़कियों का टैस्ट कुछ इस तरह Cu।tivate किया है कि पिछली मर्तबा जब मैं उनको अपने साथ यूरोप ले गया तो...”, और अफ़रोज़ जल्दी से बाल रुम के बाहर निकल आई। ये ज़िंदगी... ये ज़िंदगी का घटियापन

    वाक़ई’... ये ज़िंदगी...

    और जश्न नौ-रोज़ के दूसरे दिन इस बेचारे रैट बटलर ने अपने दोस्त, इस ख़्वाब-नाक आँखों वाले डैशिंग शह-सवार से कहा, जो परिस्तान के रास्तों पर सबसे अलग-अलग टहला करता था, “अजब लड़की है भई।”

    “हुआ करे।” और वो ख़्वाब-नाक आँखों वाला दोस्त बे-नियाज़ी से सिगरेट के धुएँ के हल्क़े बना-बना कर छत की तरफ़ भेजता रहा। और उस अ’जीब लड़की की दोस्त कह रही थी, “हुँह, इस क़दर मग़रूर, मुग़ालता-फ़ाईड क़िस्म का इंसान।”

    “हुआ करे भई। हमसे क्या।”, और अफ़रोज़ बे-तअ’ल्लुक़ी के साथ निटिंग में मसरूफ़ हो गई।

    “इतनी ऊँची बनने की कोशिश क्यों कर रही हो?”, रिफ़अ’त ने चिड़ कर पूछा।

    “क्या हर्ज है।”

    “कोई हर्ज ही नहीं? क़सम ख़ुदा की अफ़रोज़ इस अवीनाश के फ़लसफ़े ने तुम्हारा दिमाग़ ख़राब कर दिया है।”

    “तो गोया तुम्हारे लिए ज़ंजीर हिलाई जाए।”

    “उफ़्फ़ोह। जैसे आप यूँही नो लिफ़्ट जारी रखेंगी”

    “क़तई’... ज़िंदगी तुम्हारे लिए एक मुसलसल जज़्बात इज़तिराब है लेकिन मुझे उसूलों में रहना ज़ियादा अच्छा लगता है... जानती हो ज़िंदगी के ये ईयर कंडीशंड उसूल बड़े कार आमद और महफ़ूज़ साबित होते हैं।”

    “उफ़्फ़ोह... क्या बुलंद-परवाज़ी है।”

    “मैं?”

    “तुम और वो... ख़ुदा की क़सम ऐसी बेपरवाही से बैठा रहता है जैसे कोई बात ही नहीं। जी चाहता है पकड़ कर खा जाऊँ उसे। झुकना जानता ही नहीं जैसे।”

    “अरे चुप रहो भाई।”

    “सचमुच उसकी आँखों की गहराइयाँ इतनी ख़ामोश, उसका अंदाज़ इतना पुर-वक़ार, उतना बे-तअ’ल्लुक़ है कि बा’ज़ मर्तबा जी में आता है कि बस ख़ुदकुशी कर लो। या’नी ज़रा सोचो तो, तुम जानती हो कि तुम्हारे कुशन के नीचे या मसहरी के सिरहाने मेज़ पर बेहतरीन क़िस्म की कैडबरी चॉकलेट का बड़ा सा ख़ूबसूरत पैकेट रक्खा हुआ है लेकिन तुम उसे खा नहीं सकतीं... उल्लू!”

    “कौन भई...?”, प्रकाश ने कमरे में दाख़िल होते हुए पूछा।

    “कोई नहीं... है... एक... एक...”, रिफ़अ’त ने अपने ग़ुस्से के मुताबिक़त में कोई मौज़ूँ नाम सोचना चाहा।

    “बिल्ला...”, अफ़रोज़ ने इत्मीनान से कहा।

    “बिल्ला!”, प्रकाश काफ़ी परेशान हो गई।

    “हाँ भई... एक बिल्ला है बहुत ही Typical क़िस्म का ईरानी बिल्ला।”, अफ़रोज़ बोली।

    “तो क्या हुआ उसका?”, प्रकाश ने पूछा।

    “कुछ नहीं... होता क्या? सब ठीक है बिल्कुल। बस ज़रा उसे अपनी आँखों पर बहुत नाज़ है और उन मसऊद असग़र साहब का क्या होगा? जो मसूरी से मार ख़त पे ख़त निहायत इस्टाईलिश अंग्रेज़ी में तुम्हारे टेनिस की तारीफ़ में भेजा करते हैं।”

    “उनको तार दे दिया जाए...: Nose upturned-Nose upturned-Riffat”

    “हाँ। या’नी लिफ़्ट नहीं देते। जिसकी नाक ज़रा ऊपर को उठी होती है वो आदमी हमेशा बेहद मग़रूर और ख़ुद-पसंद तबीअ’त का मालिक होता है।”

    “तो तुम्हारी नाक इतनी उठी हुई कहाँ है।”

    “क़तई’ उठी हुई है। बेहतरीन प्रोफ़ाइल आता है।”

    “वाक़ई’ हम लोग भी क्या-क्या बातें करते हैं।”

    “जनाब, बेहद मुफ़ीद और अ’क़्ल-मंदी की बातें हैं।”

    “और सलाहुद्दीन बेचारा”

    “वो तो पैदा ही नहीं हुआ अब तक।”, रिफ़अ’त ने बड़ी रंजीदा अंदाज़ से कहा।

    क्योंकि ये उनका तख़य्युल किरदार था और ख़यालिस्तान के किरदार चाँद की वादी में से कभी नहीं निकलते। जब कभी वो सब किसी पार्टी में मिलें तो सबसे पहले इंतिहाई संजीदगी के साथ एक दूसरे से इस फ़र्ज़ी हस्ती की ख़ैरियत पूछी जाती, उसके मुतअ’ल्लिक़ ऊट-पटांग बातें की जातीं और अक्सर उन्हें महसूस होता जैसे उन्हें यक़ीन सा हो गया है कि उनका ख़याली किरदार अगले लम्हे उनकी दुनिया और उनकी ज़िंदगी में दाख़िल हो जाएगा।

    और फ़ुर्सत और बे-फ़िक्री की एक ख़ुश-गवार शाम इन्होंने यूँही बातें करते-करते सलाहुद्दीन की इस ख़याली तस्वीर को मुकम्मल किया था। वो सब शॉपिंग से वापिस आकर मंज़र अहमद पुर-ज़ोर शोर से तबसरा कर रही थीं जो उनसे देर तक आर्टस ऐंड क्राफ्ट्स एम्पोरियम के एक काउंटर पर बातें करता रहा था और प्रकाश ने क़तई’ फ़ैसला कर दिया था कि वो बेहद बनता है और अफ़रोज़ बेहद परेशान थी कि किस तरह उसका ये मुग़ालता दूर करे कि वो उसे पसंद करती है।

    “लेकिन उसे लिफ़्ट देने की कोई माक़ूल वज्ह पेश करो।”

    “क्योंकि भई हमारा मयार इस क़दर बुलंद है कि कोई मार्क तक पहुँच नहीं सकता।”

    ”लिहाज़ा अब की बार उसको बता दिया जाएगा कि भई अफ़रोज़ की तो मंगनी होने वाली है।”

    “लेकिन किससे?”

    “यही तो तय करना बाक़ी है। मसलन... मसलन एक आदमी से। कोई नाम बताओ।”

    “परवेज़।”

    “बड़ा आम अफ़सानवी सा नाम है। कुछ और सोचो!”

    “सलामतुल्लाह!”

    “हश! भई वाह, क्या शानदार नाम दिमाग़ में आया... सलाहुद्दीन!”

    “ये ठीक है। अच्छा, और भाई सलाहुद्दीन का तआ’रुफ़ किस तरह कराया जाए?”

    “भई सलाहुद्दीन साहब जो थे वो एक रोज़ परिस्तान के रास्ते पर शफ़क़ के गुल-रंग साये तले मिल गए।”

    “परिस्तान के रास्ते पर?”

    “चुपकी सुनती जाओ। जानती हो में इस क़दर बेहतरीन अफ़साने लिखती हूँ जिनमें सब परिस्तान की बातें होती हैं। बस फिर ये हुआ कि...”

    “जनाब हम तो इस दुनिया के बासी हैं। परिस्तान और कहानियों की पगडंडियों पर तो सिर्फ़ अवीनाश ही भटकता अच्छा लगता है।”

    “चच चच चच। बेचारा अवीनाश... गुड्डू।”

    “भई ज़िक्र तो सलाहुद्दीन का था।”

    “ख़ैर तो जनाब सलाहुद्दीन साहब परिस्तान के रास्ते पर हरगिज़ नहीं मिले। वो भी हमारी दुनिया के बासी हैं और उनका दिमाग़ क़तई’ ख़राब नहीं हुआ है। चुनाँचे सब ही मैटर आफ़ फ़ैक्ट तरीक़े से।”

    “ये हुआ कि अफ़रोज़ दिल-कुशा जा रही थी तो रेलवे क्रासिंग के पास बेहद रोमैंटिक अंदाज़ से उसकी कार ख़राब हो गई।”

    “नहीं भई ‘वाक़िआ’ ये था कि अफ़रोज़ ऑफिसर्स शाप जो गई एक रोज़ तो पता चला कि वो ग़लत तारीख़ पर पहुँच गई है, और वो अपना कार्ड भी घर भूल गई थी। बस भाई सलाहुद्दीन जो थे इन्होंने जब देखा कि एक ख़ूबसूरत लड़की बरगंडी रंग का क्योटेक्स मिलने के ग़म में रो पड़ने वाली है तो उन्होंने बेहद Gallantly आगे बढ़कर कहा कि, “ख़ातून मेरा आज की तारीख़ का कार्ड बेकार जा रहा है, अगर आप चाहें...”

    “बहुत ठीक। आगे चलो। फिर क्या होना चाहिए?”

    ”बस वो पेश हो गए।”

    “न पेश ज़ेर ज़बर... अफ़रोज़ ने फ़ौरन नो लिफ़्ट कर दिया और बेचारे दिल-शिकस्ता हो गए।”

    “अच्छा उनका कैरेक्टर...”

    “बहुत ही बैश-फ़ुल।”

    “हरगिज़ नहीं। काफ़ी तेज़... लेकिन भई डैंडी क़तई’ नहीं बर्दाश्त किए जाएँगे”

    “क़तई’ नहीं साहब... और और फ्लर्ट हों थोड़े से...”

    “तो कोई मज़ाइक़ा नहीं... अच्छा वो करते क्या हैं?”

    “भई ज़ाहिर है कुछ कुछ तो ज़रूर ही करते होंगे”

    ”आर्मी में रख लो...”

    “ओक़... हद हो गई तुम्हारे अस्सिटैंट की। कुछ सिविल सर्विस वग़ैरह का लाओ।”

    “सब बोर होते हैं।”

    “अरे हम बताएँ, कुछ करते कराते नहीं। मंज़र अहमद की तरह तअल्लुक़ादार हैं। पच्चीस गाँव और एक यही रोमैंटिक सी झील जहाँ पर वो क्रिसमिस के ज़माने में अपने दोस्तों को मदद किया करते हैं। हाँ और एक शानदार सी स्पोर्टस कार...”

    “लेकिन भई उसके बावजूद बे-इंतिहा क़ौमी ख़िदमत करता है। कम्यूनिस्ट क़िस्म की कोई मख़लूक़।”

    “कम्यूनिस्ट है तो उसे अपने पचीसों गाँव अलाहदा कर देने चाहिऐं क्यों कि प्राईवेट प्रॉपर्टी...”

    “वाह, अच्छे भाई भी तो इतने बड़े कम्यूनिस्ट हैं। इन्होंने कहाँ अपना तअ’ल्लुक़ा छोड़ा है?”

    “आप तो चुग़द हैं निशात ज़रीं... अच्छे भैया तो सचमुच के आदमी हैं। हीरो को बेहद आईडीयल क़िस्म का होना चाहिए। या’नी ग़ौर करो सलाहुद्दीन महमूद किस क़दर बुलंद-पाया इंसान है कि जनता की ख़ातिर...”

    “उफ़्फ़ुह... क्या बोरियत है भई। तुम सब मिलकर अभी यही तय नहीं कर पाई कि वो करता क्या है।”

    “क्या बात हुई है वल्लाह!”

    “जल्दी बताओ।”

    “असफ़हानी चाय में...”

    और सब पर ठंडा पानी पड़ गया।

    “क्यों जनाब असफ़हानी चाय में बड़े-बड़े स्मार्ट लोग देखने में आते हैं।”

    “अच्छा भई क़िस्सा मुख़्तसर ये कि पढ़ता है। फिज़िक्स में रिसर्च कर रहा है गोया।”

    “पढ़ता है तो ऑफिसर्स शाप में कहाँ से पहुँच गया!”

    “भई हमने फ़ैसला कर दिया है आख़िर। हवाई जहाज़ में सिवल एविएशन ऑफ़िसर है।”

    “ये आईडिया कुछ...”

    “तुम्हें कोई आईडिया ही पसंद नहीं आया। अब तुम्हारे लिए कोई आसमान से तो ख़ास-तौर पर बन कर आएगा नहीं आदमी।”

    “अच्छा तो फिर यही मिस्टर ब्वॉय नेक्स्ट डोर जो ग़ुरूर के मारे अब तक डैडी पर काल करने नहीं आए।”

    और इस तरह इन्होंने एक तख़य्युल किरदार की तख़लीक़ की थी। सब ही अपने दिलों में चुपके चुपके ऐसे किरदारों की तख़लीक़ कर लेते हैं जो उनकी दुनिया में आकर बनते और बिगड़ते रहते हैं। ये बेचारे बेवक़ूफ़ लोग।

    लेकिन प्रकाश का ख़याल था कि उनकी Mad-hatter’s पार्टी में सब के सब हद से ज़ियादा अ’क़्ल-मंद हैं। मग़रूर और ख़ुद-पसंद निशात ज़रीं जो ऐसे Fantastic अफ़साने लिखती है जिनका सर पैर किसी की समझ में नहीं आता लेकिन जिनकी तारीफ़ एडिकेट के उसूलों के मुताबिक़ सब कर देते हैं जो अक्सर छोटी-छोटी बातों पर उलझ कर बच्चों की तरह रो पड़ती है या ख़ुश हो जाती है और फिर अपने आपको सिपर इंटलेक्टुअल समझती है। रिफ़अ’त, जिसके लिए ज़िंदगी हमेशा हँसती नाचती रहती है और अफ़रोज़ जो निहायत संजीदगी से नो लिफ़्ट के फ़लसफ़े पर थीसिस लिखने वाली है क्योंकि उनकी पार्टी के दस अहकाम में से एक ये भी था कि इंसान को ख़ुद-पसंद, ख़ुद-ग़रज़ और मग़रूर होना चाहिए क्योंकि ख़ुद-पसंदी दिमाग़ी सेहत-मंदी की सबसे पहली अलामत है।

    एक सह-पहर वो सब अपने अमरीकन कॉलेज के तवील दरीचों वाले फ़्रांसीसी वज़ा के म्यूज़िक रुम में दूसरी लड़कियों के साथ पियानो के गर्द जमा’ हो कर सालाना कोंसर्ट के ओपेरा के लिए रीहरसल कर रही थीं। मौसीक़ी की एक किताब के वर्क़ उलटते हुए किसी जर्मन नग़्मा-नवाज़ की तस्वीर देखकर प्रकाश ने बेहद हमदर्दी से कहा, “हमारे अवीनाश भाई भी तो स्कार्फ़, लंबे-लंबे बालों, ख़्वाब-नाक आँखों और पाइप के धुएँ से ऐसा बोहेमियन अंदाज़ बनाते हैं कि सब उनको ख़्वाह-मख़ाह जीनियस समझने पर मजबूर हो जाएँ।”

    “आदमी कभी जीनियस हो ही नहीं सकता।”,निशात अपने फ़ैसला-कुन अंदाज़ में बोली। “अब तक जितने जीनियस पैदा हुए हैं सारे के सारे बिल्कुल Girlish थे और उनमें औ’रत का अंसर क़तई’ तौर पर ज़ियादा मौजूद था। बाइरन, शीले, कीट्स, शोपाँ... ख़ुद आपका नपोलियन आज़म लड़कियों की तरह फूट-फूटकर रोने लगता था।”, रिफ़अ’त आइरिश दरीचे के क़रीब ज़ोर-ज़ोर से अलापने लगी। मैंने ख़्वाब में देखा कि मर्मरीं ऐवानों में रहती हूँ, गाने की मश्क़ कर रही थी। बाहर बरामदे के यूनानी सुतूनों और बाग़ पर धूप ढलना शुरू’ हो गई।

    “सुपर्ब, मेरी बच्चियो हमारी रीहरसलें बहुत अच्छी तरह प्रोग्रस् कर रही हैं।”, और मौसीक़ी की फ़्रांसीसी प्रोफ़ैसर अपनी मुतमइन और शीरीं मुस्कुराहट के साथ म्यूज़िक रुम से बाहर जा कर बरामदे के सतूनों के तवील सायों में खो गईं। निशात ने इसी सुकून और इत्मीनान के साथ पियानो बंद कर दिया।

    ज़िंदगी कितनी दिल-चस्प है, कितनी शीरीं। दरीचे के बाहर साये बढ़ रहे थे। फ़िज़ा में “लाबोहेम” के नग़्मों की गूँज अब तक रक़्साँ थी। चारों तरफ़ कॉलेज की शानदार और वसीअ’ इमारतों की क़तारें शाम के धुँदलके में छुपती जा रही थीं। मेरा प्यारा कॉलेज, एशिया का बेहतरीन कॉलेज, एशिया में अमरीका लेकिन इसका उसे उस वक़्त ख़याल नहीं आया। इस वक़्त उसे हर बात अ’जीब मा’लूम नहीं हुई। वो सोच रही थी हम कितने अच्छे हैं। हमारी दुनिया किस क़दर मुकम्मल और ख़ुश-गवार है। अपनी मा’सूम मसर्रतें और तफ़रीहें, अपने रफ़ीक़ और साथी, अपने आईडीयल और नज़रिए और इसी ख़ूबसूरत दुनिया का अ’क्स वो अपने अफ़्सानों में दिखाना चाहती है तो उसकी तहरीरों को Fantastic और मस्नूई’ कहा जाता है... बेचारी मैं।

    मौसीक़ी के औराक़ समेटते हुए उसे अपने आपसे हमदर्दी करने की ज़रूरत महसूस होने लगी। उसने एक-बार अवीनाश को समझाया था कि हमारी शरीयत के दस अहकाम में से एक ये भी है कि हमेशा अपनी तारीफ़ आप करो। तारीफ़ के मुआमले में कभी दूसरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। महफ़ूज़ तरीन बात ये है कि वक़तन-फ़वक़तन ख़ुद को याद दिलाते रहा जाए कि हम किस क़दर बेहतरीन हैं। हमको अपने इलावा दुनिया की कोई और चीज़ भी पसंद नहीं सकी क्योंकि ख़ुद बादलों के महलों में महफ़ूज़ हो कर दूसरों पर हँसते रहना बेहद दिल-चस्प मश्ग़ला है। ज़िंदगी हम पर हँसती है, हम ज़िंदगी पर हँसते हैं। “और फिर ज़िंदगी अपने आप पर हँसती है।”, बेचारे अवीनाश ने इंतिहाई संजीदगी से कहा था और अगर अफ़रोज़ का ख़याल था कि वो इस दुनिया से बिल्कुल मुतमइन नहीं तो प्रकाश और निशात ज़रीं को, जो दोनों बेहद अ’क़्ल-मंद थीं, क़तई’ तौर पर यक़ीन था कि ये भी उनकी Mad-hatter’s पार्टी की cynicism का एक ख़ूबसूरत और फ़ाएदा-मंद पोज़ है।

    और सचमुच अफ़रोज़ को इस सुब्ह महसूस हुआ कि वो भी अपनी इस दुनिया, अपनी इस ज़िंदगी से इंतिहाई मुतमइन और ख़ुश है। उसने अपनी चारों तरफ़ देखा। इसके कमरे के मशरिक़ी दरीचे में से सुब्ह के रौशन और झिलमिलाते हुए आफ़ताब की किरनें छन-छन कर अंदर रही थीं और कमरे की हल्की गुलाबी दीवारें इस नारंजी रौशनी में जगमगा उठी थीं। बाहर दरीचे पर छाई हुई बेल के सुर्ख़-फूलों की बोझ से झुकी हुई लंबी-लंबी डालियाँ हवा के झोंकों से हिल-हिल कर दरीचे के शीशों पर अपने साये की आड़ी तिरछी लकीरें बना रही थीं। उसने किताब बंद कर के क़रीब के सोफ़े पर फेंक दी और एक तवील अंगड़ाई लेकर मसहरी से कूद कर नीचे उतर आई। उसने वक़्त देखा। सुब्ह जागने के बा’द वो बहुत देर तक पढ़ती रही थी। उसने ग़ुस्ल-ख़ाने में घुस कर कॉलेज में स्टेज होने वाले ओपेरा का एक गीत गाते हुए मुँह धोया और तैयार हो कर मेज़ पर से किताबें उठाती हुई बाहर निकल आई।

    क्लास का वक़्त बहुत क़रीब था। उसने बरसाती से निकल कर ज़रा तेज़ी से लाईन को पार किया और फाटक की तरफ़ बढ़ते हुए उसने देखा कि बाग़ के रास्ते पर, सब्ज़े के किनारे, उसका फ़ेडो रोज़ की तरह दुनिया जहाँ से क़तई’ बे-नियाज़ और सुल्ह-कुल अंदाज़ में आँखें नीम-वा किए धूप सेंक रहा था। उसने झुक कर उसे उठा लिया। उसके लंबे-लंबे सफ़ेद रेशमीं बालों पर हाथ फेरते हुए उसने महसूस किया, उसने देखा कि दुनिया कितनी रौशन, कितनी ख़ूबसूरत है। बाग़ के फूल, दरख़्त, पत्तियाँ, शाख़ें इसी सुनहरी धूप में नहा रही थीं। हर चीज़ ताज़ा-दम और बश्शाश थी। खुली नीलगूँ फ़िज़ाओं में सुकून और मसर्रत के ख़ामोश राग छिड़े हुए थे। कायनात किस क़दर पुर-सुकून और अपने वजूद से कितनी मुतमइन थी।

    दूर कोठी के अहाते के पिछले हिस्से में धोबी ने बाग़ के हौज़ पर कपड़े पटख़ने शुरू’ कर दिए थे और नौकरों के बच्चे और बीवीयाँ अपने क्वार्टरों के सामने घास पर धूप में अपने कामों में मसरूफ़ एक दूसरे से लड़ते हुए शोर मचा रही थीं। रोज़मर्रा की ये मानूस आवाज़ें, ये महबूब और अ’ज़ीज़ फ़ज़ाएँ... ये उसकी दुनिया थी, उसकी ख़ूबसूरत और मुख़्तसर सी दुनिया और उसने सोचा कि वाक़ई’ ये उसकी हिमाक़त है अगर वो अपनी इस आराम-देह और पुर-सुकून कायनात से आगे निकलना और सायों की अँधेरी वादी में झाँकना चाहती है। ऐसे Adventure हमेशा बेकार साबित होते हैं। उसने फ़ेडो को प्यार कर के उसकी जगह पर बिठा दिया और आगे बढ़ गई।

    बाग़ के अहाते की दूसरी तरफ़ अंग्रेज़ हम-साए का बच्चा गुल-ए-दाऊदी की कियारियों के किनारे किनारे अपने लकड़ी के घोड़े पर सवार धूप में झिलमिलाते परों वाली तैत्तरीइयों को पकड़ने की कोशिश करते हुए ख़ूब ज़ोर-ज़ोर से गा रहा था। “Ah! this bootiful, bootiful wor।d!” उसने सोचा, लिटिल मिस्टर ब्वॉय नेक्स्ट डोर, ख़ूब गाओ और अपने लकड़ी के घोड़े पर ख़याली मुहिमें सर करते रहो। एक वक़्त आएगा जब तुम्हें पता चलेगा कि दुनिया कितनी बोटी फ़ुल नहीं है।

    और अमरूदों के झुण्ड के इस पार कॉलेज के म्यूज़िक रुम में तेज़ी से रिकार्ड बजने शुरू’ हो गए और उसे याद गया कि कॉलेज से वापसी पर उसे ओपेरा के इलावा बंगाल रीलीफ़ के वराइटी शौकी रीहरसल के लिए भी जाना है और वो तेज़-तेज़ क़दम उठाने लगी। शाम को प्रोग्राम था और चारों तरफ़ ज़ोर शोर से उसके इंतिज़ामात किए जा रहे थे। बंगाल का क़हत इन दिनों अपनी इंतिहा पर पहुँचा हुआ था और हर लड़की और लड़के के दिल में कुछ कुछ करने का सच्चा जोश मौजज़न था।

    टिकट फ़रोख़्त करने के लिए साईकलों पर सिवल लाईन्ज़ की कोठियों के चक्कर लगाए जा रहे थे। मुशायरे के इंतिज़ाम के सिलसिले में बार-बार रेडिओ स्टेशन पर फ़ोन किया जा रहा था क्योंकि इसी हफ़्ते रेडिओ पर मुशायरा हुआ था जिसकी शिरकत के लिए बहुत से मशहूर तरन्नुम से पढ़ने वाले शाइर-ए-किराम तशरीफ़ ले आए थे।

    म्यूज़िक रुम के पीछे के और चर्ड में बहुत सी लड़कियाँ एक दरख़्त के नीचे इंतिहाई इन्हिमाक से मुख़्तलिफ़ कामों में मसरूफ़ थीं। कुछ प्रोग्राम के ख़ूबसूरत काग़ज़ों पर पेंटिंग कर रही थीं, कुछ क़हक़हे लगा-लगा कर इस इफ़्तिताहीया नज़्म की तक बंदी कर रही थीं जो प्रोग्राम शुरू’ होने पर कव्वालों के अंदाज़ और उन्ही के भेस में गाई जानी थी। थोड़ी देर बा’द वो भी उनमें शामिल हो गई।

    “और हमारे सुपर जीनियस ग्रुप के बाक़ी अफ़राद कहाँ रह गए?”, सईदा ने पूछा।

    “प्रकाश तो आजकल मोहरा और अवीनाश के साथ हिन्दोस्तान आज़ाद कराने में सख़्त मसरूफ़ है और रिफ़अ’त दुनिया की बे-सबाती पर ग़ौर करने के बा’द मुहब्बत में मुब्तिला हो गई है।”

    “हा बेचारी... और हमारा ज़बरदस्त अदीब, मुसव्विर और अफ़्साना-निगार अभी तक नहीं पहुँचा।”

    “आ गए हम...”, निशात ने दरख़्त के नीचे पहुँच कर अपनी जापानी छतरी बंद करते हुए कहा।

    “ख़ुदा का शुक्र अदा कर भाई, जिसने ऐसा अदीब बनाई।”, जलीस एक कलाबाज़ी खा कर बोली, “चलो अब क़व्वाली मुकम्मल करें।”, और हँस हँसकर लोटते हुए क़व्वाली तैयार की जाने लगी। कैसे बेतुके और दिल-चस्प शे’र थे, “वो ख़ुद ही निशाना बनते हैं, हम तीर चलाना क्या जानें... अनवर सिटी के पढ़ने वाले हम गाना बजाना क्या जानें।”, और जाने क्या- क्या। कितनी ख़ुश थीं वो सब... ज़िंदगी की ये मा’सूम, शरीर, छोटी-छोटी मसर्रतें!

    और इस वक़्त भी दुनिया उतनी ही ख़ूबसूरत और रौशन थी जब कि ग़ुरूब होते हुए सूरज की तिरछी-तिरछी नारंजी किरनें उसके दरीचे में से गुज़रती हुई गुलाबी दीवारों पर नाच रही थीं और किताबों की अलमारियों और सिंघार मेज़ की सफ़ाई करने के बा’द सोफ़े को दरीचे के क़रीब खींच कर शाल में लिपटी हुई क्लास के नोटिस पढ़ने में मसरूफ़ थी। बाहर फ़िज़ा पर एक आराम-देह, लतीफ़ और पुर-सुकून ख़ामोशी छाई हुई थी। थोड़े-थोड़े वक़्फ़े के बा’द दूर माल पर से गुज़रती हुई कारों के तवील हॉर्न सुनाई दे जाते थे। दूसरे कमरे में रिफ़अ’त आहिस्ता-आहिस्ता कुछ गा रही थी और मिस्टर ब्वॉय नेक्स्ट डोर के बरामदे में मद्धम सुरों में गिटार बज रहा था।

    उसने कुशन पर सर रख दिया और आँखें बंद कर लें। फ़ुर्सत, इत्मीनान और सुकून के ये लमहात। क्या आपको उन लम्हों की क़दर नहीं जो एक दफ़ा’ उफ़ुक़ की पहाड़ीयों के इस पार उड़ कर चले जाएँ तो फिर कभी लौट कर नहीं आते। वो लम्हे जब जाड़ों की रातों में ड्राइंगरूम के आतिश-दान के सामने बैठ कर किशमिश और चिलगोज़े खाते हुए गपशप और scandal mongering की जाती है। वो लम्हे जब धूप में काहिली के एहसास के साथ सब्ज़े पर बिल्लियों की तरह लौट लगा कर रिकार्ड बजाए जाते हैं और लड़ा जाता है और फिर ऐसे में इसी तरह के बीते हुए वक़्तों की याद और ये एहसास कि अपनी हिमाक़त की वज्ह से वो वक़्त अब वापिस नहीं सकता, किस क़दर तकलीफ़-देह साबित होता है।

    दरीचे के नीचे रविश पर मोटर बाईक रुकने की आवाज़ आई। उसने कुशन पर से सर उठा कर देखा। शायद मोहरा आया था। रिफ़अ’त दौड़ती हुई बरामदे की सीढ़ीयों पर से उतर के बाग़ में चली गई। उसने फिर आँखें बंद कर लीं और उसके दरीचे के सामने रविश पर से वो सब गुज़रने लगे। वो बेचारे फ़रेब-ख़ुर्दा इंसान जिन्हें ज़िंदगी ने रंजीदा क्या, ज़िंदगी जिनकी वज्ह से ग़मगीं हुई लेकिन फिर भी वो सब वहाँ मौजूद थे। उसके ख़यालों में आने पर मुसिर थे। उसे शायद याद आया... और उसके सारे भाई। दूर-दराज़ की यूनीवर्सिटीयों और मेडीकल कॉलिजों में पढ़ने वाले ये शरीर, ख़ूबसूरत और ज़िद्दी, अफ़सानवी से रिश्ते के भाई, जो छुट्टियों में घर आते हैं और उनके रिश्ते की बहन या उनकी बहनों की सहेलियाँ उनकी मुहब्बत में मुब्तिला हो जाती हैं। वो उनसे लड़ते हैं, रातों को बाग़ में चाँद को देखा जाता है, फिर वो इन सबको दिल-शिकस्ता छोड़कर या महाज़-ए-जंग पर चले जाते हैं या उनमें से किसी एक से शादी हो जाती है... उफ़ ये हमाक़तें... और उसे वो बातें याद करके इन सब पर बे-इख़्तियार तरस सा गया। ये फ़रेब-कारियाँ, ये बे-वक़ूफ़ियाँ।

    और उसे याद आया... फ़ुर्सत और बे-फ़िक्री के ऐसे ही लम्हों में एक मर्तबा अपने-अपने मुस्तक़बिल की तस्वीरें खींची गई थीं। गर्मियोंकी छुट्टियों में वो सारे बहन भाई एक जगह जमा’ हो गए थे। दिन-भर तस्वीरें उतारी जाती थीं। बुज़ुर्गों से नज़र बचा कर पेंटरी में से हलवा और आइसक्रीम उड़ाई जाती थी। बे-तुकी शाइ’री होती थी।

    उसने कहा था, “अब भई असलम का हश्र सुनिए। जब आप पास कर के निकलेंगे तो हो जाएँगे एकदम से लैफ़्टीनैंट, फिर कैप्टन, फिर मेजर। डाक्टरों को बड़ी जल्दी-जल्दी तरक़्क़ी दी जाती है। बस... और जनाब इस क़दर ख़ुश कि दुनिया की सारी लड़कियाँ आप पर पेश हैं। हाल में जा रहे हैं, पिक्चर्ज में लड़कियाँ उचक-उचक कर आपकी ज़ियारत कर रही हैं, चारों तरफ़ बर्फ़ की सफ़ेद-सफ़ेद गड़ियों जैसी, अंगारा से सुर्ख़ होंटों वाली नर्सें भागी फिर रही हैं। छुट्टी पर घर आते हैं तो सब का इंतिक़ाल हुआ जा रहा है और आप मारे शान के किसी को लिफ़्ट ही नहीं देते। स्टेस या मिल के हाँ बेहतरीन पोज़ की बहुत सी तस्वीरें खिंचवा ली हैं और वो अपनी ऐडमाइरर्ज़ को इनायत की जा रही हैं। फिर भाई लड़ाई के बा’द जो आपको कान पकड़ कर निकाल के बाहर खड़ा कर दिया जाएगा कि भैया घर का रास्ता लो तो जनाब आप अमीनाबाद के पीछे एक फटीचर सा मेडीकल हॉल खोल कर बैठेंगे। अब भाई असलम भाई हैं कि एक बद-रंग सी कुर्सी पर बैठे मक्खियाँ मार रहे हैं। कोई मरीज़ के ही नहीं देता। फिर भई एक रोज़ करना ख़ुदा का क्या होगा कि एक शानदार ब्यूक रुकेगी आपकी दुकान के आगे और इस में से एक बेहद अज़ीमुश्शान ख़ातून नाक पर रूमाल रखे उतर कर पूछेंगी कि भई हमारे फ़ेडो को ज़ुकाम हो गया है। यहाँ कोई घोड़ा हस्पताल का डाक्टर...

    और असलम ने कहा था, “हश, चुप रहो जी... बेगम साहिबा हो किस ख़याल में। बंदा तो हो जाएगा लेफ्टिनेंट कर्नल तीन साल बा’द। और लड़ाई के बा’द होता है सिविल-सर्जन। और भई क्या होगा कि एक रोज़ बी अफ़रोज़ अपने पंद्रह बच्चों की पलटन लिए बैलगाड़ी में चली रही हैं और सामने गाड़ीबान के पास ये बड़ा सा ज़र्द पग्गड़ बाँधे और हाथ में मोटा सा डंडा लिए बी अफ़रोज़ के राजा बहादुर बैठे हैं और भई हम चपरासी से कहलवा देंगे कि सिवल-सर्जन साहब मुआइना करने तशरीफ़ ले गए हैं, शाम को आईएगा। अब जनाब अफ़रोज़ बेगम बरामदे में बैंच पर बैठी हैं बुर्क़ा पहने...”

    “हाय चुप रहो भई... ख़ुदा करे जो ज़र्द पग्गड़ और बैलगाड़ी।

    “और क्या, मंज़र अहमद से जो तुम शादी करोगी तो क्या रोलज़ राईस चला करेगी तुम्हारे यहाँ? बेल गाड़ीयों पर ही पड़ी जाया करना अपने गाँव।”

    “बैलगाड़ी पर जाना तुम और ज़र्द पग्गड़ भी ख़ुदा करे तुम ही बाँधो। आए वहाँ से बड़े बेचारे।

    “और भई हज़रत-ए-दाग़ का ये होगा... शाहिद ने अपने मख़सूस अंदाज़ से कहना शुरू’ किया, “कि ये ख़ाकसार जब कई साल तक एम.एस.सी में लुढ़क चुकेगा तो वार टेक्निसिअन्स में भर्ती हो जाएगा और फिर भी रिफ़अ’त की कोठी पर पहुँचेगा कि भई बड़े दिन के सलाम के लिए आए हैं। साहब कहलवा देंगे कि फिर आना, साहब क्लब गए हैं। बस भई हम वहाँ बरसाती की सीढ़ीयों पर, गमलों की आड़ में, इस उम्मीद पर बैठ जाएँगे कि शायद बी रिफ़अ’त निकल आएँ अंदर से लेकिन जब चपरासी की डाँट पड़ेगी तो चले आएँगे वापिस और कोठी के फाटक के बाहर पहुँच कर कान में से चवन्नी निकाल सिगरेट और दो पैसों वाली सिनेमा के गाने की किताब ख़रीद कर गाते हुए घर का रास्ता लेंगे... अखियाँ मिला के... जिया भरमा के... चले नहीं जाना।”

    “नहीं भई, ख़ुदा करे, ऐसा क्यों हो तुम तो प्रोग्राम के मुताबिक़ आला दर्जे के फ्लर्ट बनोगे और रेलवे के आला इंजीनियर। अपने ठाट से सैलून में सैर करते फिरा करोगे।”, रिफ़अ’त ने कहा था। बाग़ में से रिफ़अ’त के मद्धम क़हक़हों की आवाज़ें रही थीं। जो कुछ उन्होंने मज़ाक़-मज़ाक़ में सोचा था वो नहीं हुआ। वो कभी भी नहीं होता और असलम और उसकी खींची हुई राजा बहादुर की तस्वीर उसकी आँखों में नाचने लगी।

    असलम, जो मैदान-ए-जंग में जा कर अ’र्सा हुआ लापता हो चुका था और मंज़र अहमद, जो इस शाम आर्टस ऐंड क्राफ्ट्स एम्पोरियम के बड़े-बड़े शीशों वाली झिलमिलाती हुई गैलरी में से निकल कर उसकी नज़रों से ओझल हो गया था लेकिन जैसे उसकी आँखें कह रही थीं। हमें अपने ख़यालों से भी यूँही निकाल दो तो जानें।

    और बाग़ में अँधेरा छाने लगा। गिटार बजता रहा और अफ़रोज़ सोचती रही, ज़िंदगी के ये मज़ाक़ इस रोज़ “यौम-ए-टैगोर” के लिए रेडिओ स्टेशन के ऑर्केस्ट्रा के साथ रक़्स की रीहरसल करने के बा’द वो प्रकाश और उजला के साथ वहाँ वापिस रही थी और लीला राम के सामने से वो अपनी स्पोर्टस कार पर आता नज़र आया था... प्रकाश को देखकर उसने कार रोक ली थी, “कहिए मिस शेराले क्या हो रहा है?”

    “घर जा रही हैं।”

    “चलिए में आपको पहुँचा दूँ।”

    और अफ़रोज़ ने कहना चाहा था कि हमारी कार आती होगी, आप तकलीफ़ कीजिए। लेकिन प्रकाश ने अपनी मिसाली ख़ुश-ख़ुल्क़ी की वज्ह से फ़ौरन उसकी दरख़ास्त क़बूल करली थी और फिर उसके घर तक वो कार पंद्रह मील की रफ़्तार से इस क़दर आहिस्ता ड्राईव कर के लाया था जैसे किसी बारात के साथ जा रहा हो, महज़ इसलिए कि उसे अफ़रोज़ को अपनी कार में ज़ियादा से ज़ियादा देर तक बिठाने और उससे बातें करने का मौक़ा मिल सके और उसने सोचा था कि अगर वो उस मंज़र अहमद को बहुत ज़ियादा पसंद नहीं करती तो बहरहाल माइंड भी नहीं करेगी, हालाँकि उसे अच्छी तरह मा’लूम था कि वो आला क़िस्म का फ्लर्ट है, कभी-कभी ड्रिंक भी कर लेता है और निशात ने तो ये तक कहा था कि अपनी रियासत में इसकी कैप भी मौजूद है।

    “लेकिन भई क्या तअ’ज्जुब है?”, निशात कह रही थी, “सब ही जानते हैं कि तअ’ल्लुक़ादारों के लड़के कैसे होते हैं।”

    और फिर एक रोज़ वो और प्रकाश ख़रीदारी के बा’द काफ़ी हाऊस चले गए। दोपहर का वक़्त था। बरसात की दोपहर बारिश हो कर रुकी थी। फ़िज़ा पर एक लतीफ़ सी ख़ुनकी छाई हुई थी। काफ़ी हाऊस में भी क़रीब-क़रीब बिल्कुल सन्नाटा था। वो एक सुतून की आड़ में बैठ गए और सामने के मर्मरीं सुतून पर लगे हुए बड़े आईने में इन्होंने देखा कि दूसरी तरफ़ मंज़र अहमद बैठा है। ख़ूब ये हज़रत दोपहर को भी काफ़ी हाऊस का पीछा नहीं छोड़ते। उसने ज़रा नफ़रत महसूस करने की कोशिश की और प्रकाश को देखकर वो सिगरेट की राख झाड़ता हुआ उनकी मेज़ पर बैठा, “हलो... अफ़रोज़ सुल्ताना... हलो...” उसने अपने लहजे में ब-क़द्र-ए-ज़रूरत ख़ुनकी और ख़ुश्की पैदा करते हुए मुख़्तसर-सा जवाब दे दिया और काफ़ी बनाने में मशग़ूल हो गई। वो अपनी तख़य्युल सी आँखों से बाहर की तरफ़ देखता रहा। इस वक़्त वो ग़ैर-मा’मूली तौर पर ख़ामोश था। कितना बनता है। ये शख़्स भी कभी संजीदा हो सकता है जिसकी ज़िंदगी का वाहिद मक़सद खेलना और सिर्फ़ खेलते रहना है।

    प्रकाश ख़रीदारी की फ़ेहरिस्त बनाने में मुंहमिक थी। फिर वो यकलख़्त कहने लगा, “अफ़रोज़ सुल्ताना आप मुझसे बात क्यों नहीं करतीं? मुझे मा’लूम हुआ है कि आपके दिल में मेरी तरफ़ से बड़ी ख़ौफ़नाक क़िस्म की बद-गुमानियाँ पैदा कर दी गई हैं।”

    “जी मुझे बद-गुमानी वग़ैरह की क़तई’ ज़रूरत नहीं। बद-गुमानियाँ तो उसे हो सकती हैं जिसे पहले से आपकी तरफ़ से हुस्न-ए-ज़न हो। यहाँ आपसे दिलचस्पी ही किसको है?”

    “हुँह ज़रा बनना तो देखो।”, वो कहता रहा, “मैंने सुना है कि आपको बताया गया है मैं... मैं ड्रिंक करता हूँ... और... और इसी क़िस्म की बहुत सी हरकतें... मुख़्तसर ये कि मैं इंतिहाई बुरा आदमी हूँ... क्या आपको यक़ीन है कि ये बातें सही हो सकती हैं? क्या आप मुझे वाक़ई’ ऐसा ही समझती हैं?” और उसने आहिस्ता-आहिस्ता बड़ी रोमैंटिक नुक़रई आवाज़ में बात ख़त्म कर के सिगरेट की राख झटकी और पाम के पत्तों के परे देखने लगा... और वो सचमुच बहुत परेशान हो गई कि क्या कहे क्योंकि उसने महसूस किया कि मंज़र अहमद उस वक़्त ब-क़ौल-शख़्से क़तई’ नौन-सीरियस नहीं है और उसने कहा, “भई मैंने क़तई’ कोई ज़रूरत नहीं समझी कि इसके मुतअ’ल्लिक़...”

    “अच्छा, ये बात है।” उसने बात ख़त्म करने का इंतिज़ार किए बग़ैर इसी नुक़रई आवाज़ में आहिस्ता से कहा, “इजाज़त दीजिए, ख़ुदा-हाफ़िज़ मिस शेराले...”, और वो एकदम से उसकी मेज़ पर से उठकर चला गया और कर्ली लौक्स कुशनों के अंबार पर से गिर पड़ी।

    “जनाब तशरीफ़ ले गए।”, प्रकाश ने फ़ेहरिस्त के काग़ज़ पर से सर उठा कर पूछा। बाहर अगस्त की हवाएँ हॉल के बड़े-बड़े दरीचों के शीशों से टकराती रहीं।

    रात की तारीकी बाग़ पर फैल गई। मोहरा की गुड़गुड़ाती हुई मोटर बाईक रविश पर से गुज़र कर बहर-हाल के तवील अँधरे में खो चुकी थी। निशात और रिफ़अ’त बातें करती और गुनगुनाती हुई कमरे में गईं।

    “जनाब बेहतरीन ओपेरा रहेगा रिफ़अ’त कह रही थी”

    “और हमारा ताज़ा अफ़साना जो इस क़दर सुपर्ब था, अब हमारी किताब का रेडिओ पर ब-क़ौल-शख़्से बड़ा शानदार रिव्यू किया जाएगा”, निशात सोफ़े पर कूदते हुए बोली।

    “मन तिरा सुपर जीनियस बगोयम... तुम मोहरा के अंग्रेज़ी रिसाले में अपने ओपेरा की बहुत सी तारीफ़ कर देना।”, रिफ़अ’त ने कहा।

    “हाँ ये तो करेंगे ही।”, निशात जैसे ये पहले तय कर चुकी थी।

    “भई रेडिओ स्टेशन पर आजकल सब एक से एक वाश आउट नज़र आते हैं, क्या किया जाए।”, रिफ़अ’त उकता कर बोली।

    “और शाहिद बेचारा ज़ख़्मी हो गया।”, निशात ने और भी ज़ियादा उकता कर कहा।

    “मम्मी कह रही थीं कि महाज़ पर गैस से उसकी आँखें ख़राब हो गईं।”

    “हा... चच चच... काफ़ी ख़ूबसूरत आँखें थीं इस बेचारे की।”

    और थोड़ी देर बा’द ओपेरा के इतालवी रक़्स की मश्क़ के लिए प्रकाश और उसके साथ बहुत सी लड़कियाँ गईं और वो सब ड्राइंगरूम में चली गईं।

    अफ़रोज़ के कमरे में अँधेरा हो गया। दूर, ज़िंदगी की Fantasy पर, धुँदली-धुँदली रौशनीयाँ झिलमिला रही थीं।

    फिर शोपां की मौसीक़ी फ़िज़ा में लहरा उठी। उस रात ओपेरा शुरू’ हो चुका था और तारीकी के परों पर तेज़ी से उड़ती हुई साअ’तों के साथ-साथ ख़त्म हो रहा था। रक़्स-गाह के जगमगाते दरीचों पर पर्दे गिराए जा रहे थे। यूकलिप्टस की ऊँची-ऊँची शाख़ों से भीगती रात का तन्हा और ख़ुनुक चाँद हाल के पिछले दरीचे में से अंदर झांक कर ओपेरा का आख़िरी नग़्मा सुनने की कोशिश कर रहा था, पियानो के गहरे भारी सुरों का नग़्मा, जिसकी लहरें झिलमिलाते हुए उन्नाबी मख़मलें पर्दों के पीछे डूबती जा रही थीं।

    और फुट लाईट की तेज़ सफ़ेद किरनों से जगमगाती स्टेज पर नुक़रई शैफ़ोन में मलबूस सियाह आँखों वाली लड़कियों की एक क़तार हाथों में सुनहरी और सियाह पंखियाँ लिए हुए आई और दूसरी तरफ़ से इतालवी नौजवानों का एक परा दाख़िल हुआ जिनकी टोपियों में लंबे-लंबे ख़ूबसूरत पर शाहाना अंदाज़ से सजे हुए थे और जिनकी रुपहली तलवारें स्टेज की रौशनी में झिलमिला रही थीं। इन्होंने दो ज़ानू झुक कर सेनोरिटाओं से रक़्स की दरख़ास्त की। सुर्ख़ गुलाबों के गुच्छे फेंके गए और ऑर्केस्ट्रा की एक गूँजदार धमक के साथ आख़िरी रक़्स शुरू’ हो गया। फिर तेज़ी से घूमते हुए रंगीन सायों, चक्कर काटते हुए परों और तेज़ गर्म मौसीक़ी के उस पुर-शोर भँवर की लहरें आहिस्ता-आहिस्ता फैलती गईं और रक़्स की रफ़्तार धीमी हो कर पर्दे के पीछे से बुलंद होने वाले आख़िरी सुरों की गूँज में डूब गई।

    हॉल रौशनियों से जाग उठा और सुर्ख़ कुशनों पर बैठे, दबी-दबी जमाइयाँ लेते हुए तमाशाई जैसे एक तवील ख़्वाब से चौंक कर एक-बार फिर अपनी दुनिया में वापिस गए और भारी-भारी क़दमों, ख़ुमारआलूद आँखों के साथ हाल से निकल कर क्लोक रुम, गैलरियों और पोर्च की सीढ़ीयों पर अपने अपने दोस्तों के गिरोहों में शामिल हो कर मौसीक़ी की तन्क़ीद और इधर-उधर की बेमानी, बेकार बातों में मसरूफ़ हो गए।

    “सीज़न का बेहतर अमेचियर परफोर्मेंस रहा।”

    “जैनिट सिस्टर्ज़ बिल्कुल फ्लॉप हो गईं इस मर्तबा।”

    “आज पता चला कि निशात और रिफ़अ’त कितनी Talented लड़कियाँ हैं।”

    “मसूरी में पिछले साल मैंने मारगेरैट जोर्डन को यही पार्ट करते देखा, क्या सुपर्ब चीज़ थी।”, फिर दोस्तों के ग्रुप मुंतशिर होने शुरू’ हुए। ख़वातीन क्लोक रुम से ओवर कोट लिए, मेक-अप ठीक करती हुई निकलीं और शब-ब-ख़ैर और ख़ुदा-हाफ़िज़ की मद्धम आवाज़ों के साथ कारें स्टार्ट की जाने लगीं।

    और इस वक़्त अनवर ने अफ़रोज़ को देखा जो रिफ़अ’त, निशात और प्रकाश के साथ ग्रीन रुम से निकल कर बेहद तकल्लुफ़ से अपना ओवर कोट सँभाले अपने भाईयों के साथ मशग़ूलियत से बातें करती पोर्च की मर्मरीं सीढ़ीयों से उतर कर लंबी-लंबी चमकीली कारों की तवील फ़्लैट की तरफ़ अपनी मोर्रिस में बैठने के लिए जा रही थी।

    “उफ़्फ़ुह! रफ़ी देखना, चाँद कितना स्मार्ट लग रहा है।”, लड़कियों में से एक ने चलते-चलते कहा और सब आसमान की तरफ़ देखने लगे। चाँद यूकलिप्टस की टहनियों में से निकल कर आसमान की शफ़्फ़ाफ़ सतह पर तीर रहा था। “ख़ुदा तुम लड़कियों से हर ज़ी-होश जानदार को महफ़ूज़ रखे।” ये निशात के भाईयों में से एक की आवाज़ थी और फिर निशात उसे पोर्च के एक ऊँचे यूनानी सुतून के पीछे खड़ा देखकर चुपके से बोली, “जनाब भी तशरीफ़ लाए थे।”

    “जी हाँ और शाहिद साहब भी।”, रिफ़अ’त ने कहा और फिर उनकी कार ज़न्नाटे के साथ सामने से निकल गई और लामार्टीज़ के लड़कों की एक टोली ने रक़्स गाह से निकल कर सड़क पर जाते हुए “जिप्सी मून” ऊँचे सुरों में शुरू’ कर दिया था।

    फिर वो आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ियाँ उतरता हुआ अपने दोस्तों के साथ अपनी कार की तरफ़ बढ़ा जो मोटरों की शानदार फ़्लैट के आख़िरी सिरे पर दरख़्तों के अँधरे में खड़ी थीं। वो सोच रहा था, हमेशा यही होता है। तुम सोचते हो गीतों की सर-ज़मीन में रहने वाली वो लड़की जिसके बालों में सुर्ख़ गुलाब सजे हुए हैं कभी कभी तो तुम्हारे ख़्वाबों के दरीचे के नीचे से गुज़रेगी और तुम उसे अपना गिटार का नग़्मा सुना सकोगे और सुर्ख़ गुलाबों में रहने वाली लड़की कहती है कि एक रोज़ वो मौसम-ए-गुल का शहज़ादा उसके ख़्वाबों के ऐवानों में से निकल कर आएगा और बस फिर सब ठीक हो जाएगा लेकिन ट्रेजडी देखिए वो दोनों इस पगडंडी पर मिल जाते हैं जो परियों की सर-ज़मीन को जाती है लेकिन एक दूसरे को देखे बग़ैर बेपरवाही और बे-नियाज़ी से गुज़र जाते हैं और ओपेरा ख़त्म हो जाता है और तमाशाई अपने अपने सोफ़ों पर बैठे-बैठे पहलू बदल कर रुमालों और दस्ती पंखियों की ओट में से अपने साथीयों से कहते हैं।

    “क्यों... कैसी रही?”

    और शाहिद ने आगे बढ़कर कहना चाहा... कितने झूटे हो भाई। तुम सब शुरू’ से आख़िर तक एक तवील मुग़ालते, एक ख़ूबसूरत, दिलचस्प फ़रेब में मुब्तिला रहने के इस क़दर शौक़ीन क्यों हो? तुम्हारा “लाबोहेम” का ओपेरा, “जिप्सी मून” के नग़्मे और शोपान की मौसीक़ी, तुम्हारे तिलोत्तमा के तसव्वुरात, रफ़ाईल और लेनार्डो की तस्वीरें और ब्राउनिंग की नज़्में। तुम्हारी बद-दिमाग़ अफ़रोज़ सुल्ताना और तुम्हारी सुपर इंटलेक्टुअल और मग़रूर अफ़्साना-निगार निशात, मंज़र अहमद और उसकी स्पोर्टस कार, प्रकाश और उसकी Mad-hatter’s अवीनाश और उसकी फ़ैशनेबुल Cynicism तुम सब इन सब चीज़ों, इन सारी बातों समेत आज की रात मेरे भूके रहने की वज्ह साबित नहीं कर सकते।

    तुम तो इस का ख़याल भी नहीं कर सकते कि तुम जैसा इंसान, जो तुम्हारे साथ ओपेरा में सकता है और जिसके शहर के सारे काफ़ी हाऊस और सारे फ़्रांसीसी और इतालवी रेस्टोराँ खुले हुए हैं, बग़ैर कुछ खाए पिए भी ज़िंदा रहने की कोशिश कर रहा है। स्लिमिंग के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि उसके पास पैसे नहीं हैं।

    मैं तुम्हारे मिस्टर शोपां से कहना चाहता हूँ, क़िबला आपको अच्छी तरह डिनर उड़ाने के बा’द ही ये आसमानी नग़्मे कम्पोज़ करने की सूझती होगी। आप मेरी जगह तशरीफ़ ले आइए और मैं आपके पियानो पर पहुँच कर ऐसे-ऐसे नग़्मे बना सकता हूँ जिनको सुनकर दुनिया आपके और आपके सारे क़बीले वालों के शाहकार, जो लोगों को अब तक अहमक़ बनाते रहे हैं, हमेशा के लिए भूल जाए। तुम्हारा जिप्सी मौन कम अज़ कम मेरी आँखें तो ठीक नहीं कर सकता।

    तुम्हारी इत्र-बेज़ हवाएँ इंडियन रेडक्रास की इस ख़ूबसूरत वेल्फेयर ऑफ़िसर तक मेरा कोई पैग़ाम नहीं पहुँचा सकतीं जो उस वक़्त क़ाहिरा में ज़ख़्मियों के साथ ऐसी ही फ़रेब आलूद ख़ुश-गवार बातें कर के उन्हें इसी हिमाक़त में मुब्तिला करने की कोशिश में मसरूफ़ होगी। वो वेल्फेयर ऑफ़िसर जो बच्चों की तरह लकड़ी के रंगीं टुकड़ों और चमकीली तस्वीरों के ज़रिए बहला कर ये भुलाने की कोशिश करती थी कि मेरी आँखें, जो ख़ूबसूरत कहलाती थीं, जर्मनों की गैस ने ख़राब कर दी हैं और मुझे डिस्चार्ज कर दिया जाए और मुझे कहीं नौकरी मिल सकेगी। यक़ीनन तुम्हारी मोनालीज़ा और तुम्हारा रूपहला चाँद...”

    और चाँद सेब के ऑर्चर्ड पर तैरता हुआ उसकी बालकोनी के बिल्कुल ऊपर पहुँच गया। वो बाहर निकल आई और रेलिंग पर झुक गई। मिस्टर ब्वॉय नेक्स्ट डोर का ड्राइंगरूम ख़ामोश पड़ा था और कहीं मद्धम सुरों में गिटार बजाया जा रहा था और उसने कहना चाहा... मिस्टर ब्वॉय नेक्स्ट डोर... तुम इतने ख़ामोश क्यों हो? तुम और तुम्हारा सियाह आँखों वाला दोस्त... आधी रात के चाँद की तरह ज़र्द और ग़मगीं... क्या तुम्हें हम-सायों के इस छोटे बच्चे ने नहीं बताया कि दुनिया कितनी ब्यूटीफुल है और ऐसी ख़ूबसूरत, शादाब और बश्शाश दुनिया में ग़मगीं रहना जुर्म है और मसर्रत की सेहत मंदी की तौहीन।

    क्या तुमने भी तख़य्युल किरदार बनाए हैं? क्या तुमको भी ख़्वाब देखने आते हैं? जब रूपहला चाँद सेब के और चर्ड पर झिलमिलाता है और फ़िज़ाओं में मोज़ारट के नग़्मे रक़्साँ होते हैं उस वक़्त में तुमसे चुपके से पूछना चाहती हूँ... क्या तुम मुझे जानते हो? क्योंकि मैं तुमको बहुत अच्छी तरह जानती हूँ... जैसे हम जन्म-जन्म के एक दूसरे के ख़ामोश साथी हैं। हम सब एक दूसरे को जानते हैं लेकिन कह नहीं सकते। क्या तुम भी तन्हा हो। इतनी बड़ी दुनिया और दुनिया वालों में घिरे हुए... लेकिन बिल्कुल तन्हा।

    और नीचे पहलू के बाग़ में दो साये आहिस्ता-आहिस्ता टहल रहे थे। और उनमें से एक साया चाँद के मुक़ाबिल में खड़ा हो कर कहने लगा, ख़ुदा की क़सम, मेरे दोस्त, तुम जानते हो कि ये सब ग़लत है। यहाँ सब झूटे हैं लेकिन फिर भी तुम बेवक़ूफ़ बनते हो। मुझसे पूछो, मैं तुम्हें बताऊँगा कि ज़िंदगी क्या चीज़ है। वो सब्ज़ आँखों वाली ज़र्द-रू जूलियट, जो नवाब के साथ वाल्ज़ करती थी और जिसने एक दफ़ा’ मेरे साथ भी रक़्स किया था और मुझे यक़ीन हो चला था कि मैं हिज़ हाइंस का ए. डी. सी. बना दिया जाऊँगा, वो अब भी कॉकटेल पार्टियों के बा’द ढोलक के साथ इसी तरह गाती है, “मैं बोली चिरिया को काग लिए जाए।”, सब सुनते हैं और ख़ुश होते हैं।

    तुमने उस लुग़्वियत, पर ग़ौर किया है? चिड़ियाँ और को्वे... चिड़ियाँ और कव्वे या तितलियाँ और भँवरे... ज़िंदगी का तआ’क़ुब... ये दीवानगी... ये जुनून... मुझसे मेरी बिंत-ए-अम, ख़ूबसूरत और शरीर रिफ़अ’त ने कहा था, “हाय शाहिद भाई, तुम कितने गुड्डू हो। तुम जंग से वापिस जाओ फिर बहुत सारे प्रोग्राम बनाएँगे।”

    और मैंने, कितना अहमक़ था मैं, इन अल्फ़ाज़ के सहारे पर कितने ख़्वाब देखे। रिफ़अ’त मेरे साथ होगी और ज़िंदगी का ख़ुश-गवार और फूलों से घिरा हुआ रास्ता मेरे सामने लेकिन इस वक़्त में यहाँ, इस अँधरे में, अकेला टहल रहा हूँ और मेरे साथ सिर्फ़ रिफ़अ’त का एक ख़त है जिसमें उसने लिखा है, “हाय शाहिद भाई, कितना अफ़सोस है तुम्हारी आँखें ख़राब हो गईं। ख़ुदा करे जल्द बिल्कुल अच्छे हो जाओ। शाम को हमारे ओपेरा में ज़रूर आना।” और बेवक़ूफ़ मोहरा रूमान की इऩ्ही पटी हुई पगडंडियों पर ख़ुश-ख़ुश चल रहा है जिन पर ज़र्द चाँद झिलमिलाता है।

    और ज़र्द चाँद दरख़्तों के पीछे छिप गया। उसने कहा ठीक है भाई, लेकिन इस हिमाक़त में मुब्तिला हो जाने का एहसास ही कितना पुर-लुत्फ़ और दिल-चस्प होता है। मैंने उससे कहना चाहा, साइमन स्टाइलिश की तरह जो ऊँचा सुतून तुमने अपने लिए मुंतख़ब किया है उसकी बुलंदी पर से एक लम्हे के लिए नीचे उतर आओ और उन ख़ुद-रौ ख़ुशबूदार फूलों की झाड़ियों के पास मेरे पास घास पर बैठो और हम मुहब्बत के वो गुज़रते हुए गीत सुनें जो वक़्त की सुनहरी रेत के इस पार पहुँच कर फिर कभी वापिस नहीं आते। मुहब्बत के वो आसमानी, उलूही नग़्मे जो शोपां, मज़ारिट और हैंडल ने ऐसे ही वक़्त में, इन ही लम्हों के लिए, तख़लीक़ किए थे।

    उस रोज़ सईदा कह रही थी, अनवर भाई कितना अच्छा लगता है कोई हमको पसंद करे, हम किसी को पसंद करें। कोई हमें चाहे। ज़िंदगी के ख़ाली, बेमानी और बेरंग नुक़ूश में अपनी छोटी-छोटी शिकस्तों के रंज, फ़त्ह मंदियों के ग़ुरूर और नन्ही-मुन्नी मसर्रतों के इत्मीनान बख़्श एहसासात से दिलकशी और ख़ूबसूरती पैदा होती है। ये अहमक़ाना, तिफ़्लाना ख़्वाहिशें... कोई हमें चाहे।

    तुम ये कहते हो... तुम जो सोसाइटी की सारी “हाई लाइट्स” के पसंदीदा और महबूब हीरो हो। निशात जैसी मग़रूर लड़की तुम्हारे साथ नाचती है। जलीस तुमको रोज़ाना फ़ोन करती है। उजला, जो कभी किसी को गाना नहीं सुनाती, रेडिओ पर महज़ इसलिए गाती है कि तुम सुनो और चूँकि सिर्फ़ एक ख़ुद-पसंद लड़की ने तुम्हारे सामने झुकने से ख़ामोशी से इंकार कर दिया है तो मरे जा रहे हो, अहमक़! हम सब अहमक़ हैं उसने कहा और गिटार की आवाज़ मद्धम होती गई और कुँवारी रात का अँधेरा बाग़ पर झुक गया।

    और वो बालकोनी पर से हट कर अंदर गई। वो अपने बुलंद सुतून पर से नहीं उतर सकती थी। नहीं उतरना चाहती थी। वो अपनी शिकस्त के एतराफ़ का ख़याल भी नहीं कर सकती। उसने सोचा और वो परियों की सर-ज़मीन को जाने वाली दो मुतवाज़ी पगडंडियों पर थोड़ी दूर तक इसी तरह चलते रहे और फिर ये पगडंडीयाँ एक दूसरे को पार करती हुई अलाहदा हो गईं।

    और रिफ़अ’त ने एक रोज़ ख़ुशी से उछलते हुए कहा, अफ़रोज़ प्यारी एक ट्रेजेडी हो गई। तुमने तो नो लिफ़्ट कर दिया और इस बेचारे ने अपनी शिकस्ता दिली से उकता कर आख़िर शादी की दरख़ास्त कर ही दी और अब मैं तुम्हारे और मम्मी के साथ मसूरी नहीं जा सकूँगी... हम कश्मीर जा रहे हैं।

    और अफ़रोज़ के ख़्वाबों ने जिस तख़य्युल किरदार को जन्म दिया था वो उसी की हैसियत से उसकी ज़िंदगी में थोड़े से वक़्फ़े के लिए आया और इसी तरह निकल गया।

    अफ़रोज़ के लिए वो सिर्फ़ Mr Next-door Boy था, चाँद की वादी का बासी। लेकिन अब वो मिस्टर ब्वॉय नेक्स्ट डोर नहीं रहा। रिफ़अ’त के नज़दीक वो महज़ अनवर था। सिवल सर्विस का एक आला ओहदेदार जो अगले माह उससे शादी करने वाला था। क्योंकि रिफ़अ’त, जिसके लिए ज़िंदगी एक मुसलसल जज़्बात इज़तिराब थी, उसके तआ’क़ुब में कामयाब हो चुकी थी। रिफ़अ’त माह-अस्ल मनाने के लिए गुलमर्ग चली गई। अफ़रोज़ अपने घर वालों के साथ हस्ब-ए-मा’मूल मसूरी जा रही थी।

    ज़र्द चाँद बहुत देर तक उसके साथ-साथ चलने के बा’द शिवालिक की पहाड़ीयों की लकीर के पीछे जा छिपा और दोहरा एक्सप्रेस के अँधरे कम्पार्टमंट में वो इस उधेड़ और बातूनी कर्नल की मुसलसल आवाज़ से जाग उठी जिसने अपना तआ’रुफ़ अपने हम-सफ़रों से कर्नल भरोचा या चड्डा या हांडो या उसी क़िस्म के किसी ख़ूबसूरत से नाम से किराया था। वो बेहद उ’म्दा उर्दू बोल रहा था और अपने ख़याल में कोई बहुत ही ज़रूरी नुक्ता बयान कर के जो मुंशी से और अच्छे लहजे में फ़ारसी का कोई शे’र पढ़ डालता था। उसने खिड़कियों में से आती हुई रात की ख़ुनुक हवाओं से बचने के लिए सारी का आँचल चेहरे पर डाल लिया।

    वो कह रहा था, “अस्तग़्फ़िरुल्लाह!” मैंने कहा, क्या क़यामत है, मुसलमान औ’रत को शराब पिला रहे हो। क़ाइद-ए-आज़म के पान इस्लामिक निज़ाम के अख़लाक़ी और मज़हबी सतूनों का क्या हश्र होगा। जवाब मिला, बंदा-नवाज़ ईं हिन्दोस्तान न-बाशिद। ये जंग का ज़माना है और ये क़ाहिरा की रातें हैं जहाँ की मुसलमान औरतें अपनी ज़िंदगी और अख़लाक़ी क़दरों को एलिज़ाबेथ ऑर्डन और मैक्स फैक्टर के डिब्बों में ईयर टाइट करवा के पैरिस और न्यूयार्क से मँगवाती हैं और फिर हमारे लड़के... मैं कहता हूँ ऐश कर लेने दो। साक़-ए-सीमीं और लब हाय लालीँ के शे’र पढ़ते-पढ़ते ख़त्म हो गए... ख़ूब पीते हैं... ख़ूब ठाठ करते हैं... बड़े-बड़े शौहरों की बीवीयाँ और ऊँचे-ऊँचे बापों की बेटियां उनके साथ कौंसिल ख़ाने के बाल रुम की मर्मरीं सतूनों वाली रक़्स-गाहों और नील के रुपहले साहिलों पर उनके साथ नाचती हैं और हमारे लड़के सब कुछ भूल कर उन वक़्ती लहरों के रेले में बहते जा रहे हैं

    मैं कहता हूँ अरे बेटा, आजकल तुम्हारे तजरबों के लिए अच्छा ज़माना है। जंग जारी है। लड़ाई के मैदान से अपनी मेडीसन और सर्जरी के ऐसे-ऐसे नए तजुर्बे हासिल कर सकते हो जो पहले कभी मिले थे और अब आइन्दा मिल सकेंगे... पर उन्हें कुछ परवाह नहीं। मैं सोचता हूँ, चलने दो। सब ठीक है। ज़िंदगी उसी का नाम है और फिर ये लड़कियाँ... जो आपके चपरासियों के पिटकों की तरह कमर के गर्द दुपट्टों के क्रास बनाए अड़ी फिरती हैं। ये आँधी तो भाई जान सबको बहाए लिए जा रही है। कहाँ तक इससे बच पाओगे और उसके एक साथी ने कहना चाहा, “लेकिन कर्नल... सैक्स”, और कर्नल ने फ़ौरन उसकी बात काट दी।

    “Sex be damned my dear Sir۔ यहाँ जो बात है वो है, उसे ग्लास केस में छिपा कर रख देना कहाँ की अ’क़्ल-मंदी है?”

    उफ़... क्या लुग़्वियत है... उसने सो जाना चाहा। कर्नल इसी तरह बातें करता रहा। रात के ख़ामोश अँधरे में पहियों के शोर की मुतवाज़िन यकसानियत कर्नल की करख़्त आवाज़ से मिल-जुल कर बड़ा नागवार सा असर पैदा कर रही थी। या अल्लाह ज़िंदगी कितनी ज़लील चीज़ है और कर्नल की बातों का सिलसिला जारी था।

    “मशरिक़-ए-वुस्ता में मुक़ीम हिन्दुस्तानी फ़ौजों को महफ़ूज़ करने के लिए हिन्दोस्तान से जो डांसिंग पार्टी गई थी उस में लाहौर की एक हिन्दुस्तानी ईसाई लड़की रिहाना भी थी। मुझसे पूछा गया, कर्नल साहब, आप ख़ास क़िस्म का प्राईवेट परफोर्मेंस भी पसंद करेंगे? मैंने कहा, बंदा-नवाज़ मुफ़्त हाथ आए तो बुरा किया है?”

    “ईं... क्यों? ही ही ही। रिहाना मुझसे मिली तो कहने लगी, कर्नल साहब, आपके हमनाम एक डाक्टर लाहौर छावनी में भी हुआ करते थे। बहुत अच्छे आदमी थे बेचारे। सुना है मर गए। मेरी मामा उनके हस्पताल में नर्स थीं। बहुत तारीफ़ किया करती थीं उनकी। पर मैं तो बहुत छोटी थी जब। मैंने हँसकर कहा, मुकर्रमा वो तुम्हारे बड़े होने का इंतिज़ार करने से पहले ही कैसे मर सकते थे? ही ही ही क्यों? क्या ख़याल है तुम्हारा?”

    अफ़रोज़ ने फिर सोने की कोशिश की। कर्नल कहता रहा, “रूसी चीफ़ आफ़ दी स्टाफ़ के साथ कई साये वालियाँ भी थीं। अमरीकन कौंसिल की लड़की कहने लगी, “कर्नल तुम बहुत फ़ुज़ूल आदमी हो, बातें बहुत करते हो। पहले हमारे ज़ुकाम का ईलाज करो।”

    “मैंने कहा, फ़ुज़ूल सही, लेकिन मुकर्रमा, जब सर में दर्द होता है तो हम ही याद आते हैं। वो कहती थी कलकत्ते और शिमले में मैं तुम हिंदूस्तानियों से मिलते हुए ज़रा हिचकिचाती थी। लेकिन ये क़ाहिरा है और यहाँ की रातें बहुत गर्म होती हैं और “शरारत” की ख़ुशबू में बहुत तेज़।”

    हवा अफ़रोज़ का आँचल उड़ा रही थी। ट्रेन चलती रही। कर्नल कह रहा था, “अभी बेगमात-ए-अवध नैनीताल और मसूरी से वापिस नहीं आई हैं। ज़रा बारिशों के बा’द लखनऊ में रौनक जाने दो। ख़ाकसार एक कॉकटेल पार्टी और एक टी डांस छोड़ेगा। भाई जान, ख़ूब जानता हूँ ज़िंदगी का तआ’क़ुब कहाँ तक करना चाहिए। मेरा बड़ा लड़का भी लेफ्टिनेंट कर्नल है और उसे भी मा’लूम है और मुझे भी कि जहाँ तक उसूलों का ताल्लुक़ है, हम दोनों अपने अपने रास्तों पर इत्मीनान से चल रहे हैं और हमारे रास्ते कभी भी एक दूसरे को नहीं काट सकते।”

    और ट्रेन की रफ़्तार एक स्टेशन के कहर आलूद धुँदलके में दाख़िल होते हुए धीमी हो गई और वो अपने हम-सफ़रों को ख़ुदा-हाफ़िज़ कहता हुआ प्लेटफार्म पर उतर गया... ज़िंदगी के तआ’क़ुब में, अफ़रोज़ ने सोचा। और कर्नल के जाने के बा’द उसका एक दोस्त दूसरे दोस्त से कह रहा था, “कर्नल की बातें सुनकर तुमने ख़याल किया होगा कि ये आला दर्जे का लफंगा शख़्स है, लेकिन ‘वाक़िआ’ ये है भाई जान कि उससे ज़ियादा शरीफ़ और पुर-ख़ुलूस आदमी दुनिया में ही नहीं मिल सकता। अगर तुम रात के दो बजे उसे बुलाओ तो अपना बैग सँभाले नंगे-पाँव भागता हुआ पहुँच जाएगा। ये जो कुछ कहता या ज़ाहिर करता है महज़ अपना और दूसरों का जी ख़ुश करने के लिए। बीवी मर चुकी है, बड़ा लड़का भी लेफ्टिनेंट कर्नल है और एक दामाद आई.सी.ऐस., तीन लड़कियाँ इंग्लैंड में हिन्दुस्तानी फ़ौजों के लिए कैंटीन चला रही हैं।”

    और ट्रेन चलने लगी। कम्पार्टमंट में फिर अँधेरा हो गया। अफ़रोज़ ने आँखों पर हाथ रख लिए और उसे मंज़र अहमद याद गया जो जलीस से शादी कर के अपनी नई कार पर कश्मीर जा कर माह अस्ल मनाने के प्रोग्राम बनाने में मसरूफ़ था और इस वक़्त उसको एक बड़ा पर मसर्रत, पुर-सुकून सा एहसास हुआ। उसका सुतून अब भी सबसे अलाहदा और सबसे बुलंद है। ज़िंदगी की इस तग-ओ-दो, उस कशाकश से बे-नियाज़ और बे-तअ’ल्लुक़ ज़िंदगी की ये मुसलसल चलो पकड़ो, जाने पाए, चिरियाँ और को्वे, तितलियाँ और भँवरे, ढोलक पर जैसे पतंग पीछे डोर गाती हुई सब्ज़ आँखों वाली जूलियट और उसके पीछे नवाब, निशात और उसके अफ़साने, रिफ़अ’त और उसके पीछे दौड़ती हुई मंज़र अहमद की तेज़-रफ़्तार स्पोर्टस कार, रूसी चीफ़ आफ़ दी स्टाफ़ की साये वालियाँ और उनके पीछे उनके ज़ुकाम और दर्द-ए-सर का ईलाज करता हुआ दिल-शिकस्ता कर्नल चड्डा या भडूचा या हांडो जिसकी बीवी मर चुकी है और जिसका बेटा भी लेफ्टिनेंट कर्नल है और दामाद आई.सी.ऐस. और जो आक़िबत-अँदेश, तजरबाकार नौजवान डाक्टरों को मश्वरा देता है कि बेहतरीन मौक़ा है मेडीसन और नर्सरी के तजरबों का, ज़ियादा से ज़ियादा फ़ायदा उठा लू, नील के साहिलों पर ख़ूब नाच लो, फिर कहाँ ये जंग होगी, कहाँ तुम और कहाँ क़ाहिरा की रातें। दर-अस्ल वो बहुत अच्छा आदमी है। यहाँ सब बहुत अच्छे आदमी हैं, एक दूसरे का ख़याल करने वाले, एक दूसरे के तआ’क़ुब में सर-गर्दां। सब अपने अपने महवर पर तेज़ी से घूम रहे हैं और जो उनकी लपेट में जाता है वो भी इसी तेज़ी से घूमने लगता है और इस भागती हुई दुनिया में सलाहुद्दीन महमूद और मिस्टर ब्वॉय नेक्स्ट डोर के तख़य्युल किरदारों की क़तई’ कोई जगह नहीं।

    और फिर यक-लख़्त उसे एक बेहद अ’जीब ख़याल आया, निहायत शिद्दत से उसका जी चाहा कि वो खिड़की में से पुकार कर कहे, कर्नल चड्डा, इधर आओ, मेरी बात सुनो, तुम बिल्कुल ठीक कहते हो। ज़िंदगी इसी का नाम है। मेरी बात सुनते जाओ। ख़ूब ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाए, कर्नल चड्डा, कर्नल भडूचा, कर्नल हांडो।

    लेकिन कर्नल कब का प्लेटफार्म के धुँदलके में खो चुका था।

    और मोनालीज़ा के होंटों पर हल्का सा तबस्सुम बिखर गया जैसे वो ये सब बहुत पहले समझ चुकी है।

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