न जाएगा मेरे दिल से ख़याल-ए-अबरू-ए-दिलबर
कि तेग़ों ही के साए में तो है जन्नत मुसलमाँ की
बल पड़े चितवन पे अबरू तन के ख़ंजर हो गए
ज़िक्र-ए-वस्ल आते ही वो जामे से बाहर हो गए
है इसी में प्यार की आबरू वो जफ़ा करें मैं वफ़ा करूँ
जो वफ़ा भी काम न आ सके तो वही कहें कि मैं क्या करूँ