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दरख़्त पर शेर

तुम लगाते चलो अश्जार जिधर से गुज़रो

उस के साए में जो बैठेगा दुआ ही देगा

अज्ञात
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गिल है आरिज़ तो क़द्द-ए-यार दरख़्त

कब हो ऐसा बहार-दार दरख़्त

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल