जलन पर शेर
हसद एक बुरा जज़्बा है
ही लेकिन शायरी में ये किस तरह अपनी सूरतें बदलता है और इश्क़ के बाब में इस की कितनी दिल-चस्प शक्लें नज़र आती हैं ये देखने के लायक़ है। दर-अस्ल शायरी में इस तरह के तमाम मौज़ूआत अपनी आम समाजी तफ़्हीम से अलग एक मानी क़ाएम करते हैं। हसद को मौज़ू बनाने वाली शायरी के इस इन्तिख़ाब को पढ़ कर आप लुत्फ़ अन्दोज़ होंगे।
शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहता है कि मिलन की रात में दीपक बुझा दो, क्योंकि उस घड़ी में उजाले से ज़्यादा निकटता और एकांत चाहिए। “जलने वाले” उन प्रेमियों का रूपक हैं जो विरह की आग में तड़पते हैं। आनंद की सभा में उनका दर्द बेमेल लगता है, इसलिए शेर में व्यंग्य के साथ अलग-थलग पड़ने का भाव भी है।