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ख़ुद-अज़िय्यती पर शेर

यूँ तो ब-ज़ाहिर अपने

आप को तकलीफ़ पहुँचाना और अज़िय्यत में मुब्तला करना एक ना-समझ में आने वाला ग़ैर फ़ित्री अमल है, लेकिन ऐसा होता है और ऐसे लम्हे आते हैं जब ख़ुद अज़िय्यती ही सुकून का बाइस बनती है। लेकिन ऐसा क्यूँ? इस सवाल का जवाब आपको शायरी में ही मिल सकता है। ख़ुद अज़िय्यती को मौज़ू बनाने वाले अशआर का एक इंतिख़ाब हम पेश कर रहे हैं।

'मुसहफ़ी' हम तो ये समझे थे कि होगा कोई ज़ख़्म

तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ऐसा करूँगा अब के गरेबाँ को तार तार

जो फिर किसी तरह से किसी से रफ़ू हो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

सफ़र में हर क़दम रह रह के ये तकलीफ़ ही देते

बहर-सूरत हमें इन आबलों को फोड़ देना था

अंजुम इरफ़ानी

रफ़ू कर इसे बख़िया-गर ख़ुदा के लिए

कि चाक-ए-दिल से हवा ख़ुश-गवार आती है

जलील मानिकपूरी
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रहा कोई तार दामन में

अब नहीं हाजत-ए-रफ़ू मुझ को

इक़बाल सुहैल

किया है चाक दिल तेग़-ए-तग़ाफ़ुल सीं तुझ अँखियों नीं

निगह के रिश्ता सोज़न सूँ पलकाँ के रफ़ू कीजे

आबरू शाह मुबारक