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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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गली शायरी

उस गली ने ये सुन के सब्र किया

जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं

जौन एलिया

दिल मुझे उस गली में ले जा कर

और भी ख़ाक में मिला लाया

Interpretation: Rekhta AI

मीर तक़ी मीर यहाँ दिल को ऐसी ज़िद्दी ताक़त बताते हैं जो इंसान को फिर उसी जगह ले जाती है जहाँ दर्द मिला था। “मिट्टी में मिलाना” हार, अपमान और खुद को बिलकुल टूट जाने का रूपक है। भाव यह है कि चाहत रोकना मुश्किल है, और वही चाहत बार-बार गिरा भी देती है।

Interpretation: Rekhta AI

मीर तक़ी मीर यहाँ दिल को ऐसी ज़िद्दी ताक़त बताते हैं जो इंसान को फिर उसी जगह ले जाती है जहाँ दर्द मिला था। “मिट्टी में मिलाना” हार, अपमान और खुद को बिलकुल टूट जाने का रूपक है। भाव यह है कि चाहत रोकना मुश्किल है, और वही चाहत बार-बार गिरा भी देती है।

मीर तक़ी मीर

हर गली कूचे में रोने की सदा मेरी है

शहर में जो भी हुआ है वो ख़ता मेरी है

फ़रहत एहसास

यूँ उठे आह उस गली से हम

जैसे कोई जहाँ से उठता है

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि प्रिय की गली छोड़ना कवि के लिए जीवन छोड़ने जैसा है। “आह” दर्द की आख़िरी-सी साँस बन जाती है और “उठना” साधारण उठना नहीं, बल्कि अंतिम विदाई का संकेत है। गली प्रेम की पूरी दुनिया है; वहाँ से हटते ही सब कुछ ख़त्म-सा लगता है। भाव में वियोग, शोक और नश्वरता की गहरी छाया है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि प्रिय की गली छोड़ना कवि के लिए जीवन छोड़ने जैसा है। “आह” दर्द की आख़िरी-सी साँस बन जाती है और “उठना” साधारण उठना नहीं, बल्कि अंतिम विदाई का संकेत है। गली प्रेम की पूरी दुनिया है; वहाँ से हटते ही सब कुछ ख़त्म-सा लगता है। भाव में वियोग, शोक और नश्वरता की गहरी छाया है।

मीर तक़ी मीर

गली के मोड़ से घर तक अँधेरा क्यूँ है 'निज़ाम'

चराग़ याद का उस ने बुझा दिया होगा

शीन काफ़ निज़ाम

तेरा कूचा तिरा दर तेरी गली काफ़ी है

बे-ठिकानों को ठिकाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर

इक दिन तिरी गली में मुझे ले गई हवा

और फिर तमाम उम्र मुझे ढूँढती रही

विपुल कुमार

आप अपनी गली के साइल को

कम से कम पर सवाल तो रखिए

जौन एलिया

गली का आम सा चेहरा भी प्यारा होने लगता है

मोहब्बत में तो ज़र्रा भी सितारा होने लगता है

अहमद अताउल्लाह

कितनी वीरान है गली दिल की

दूर तक कोई नक़्श-ए-पा भी नहीं

नाज़िम सुल्तानपूरी
बोलिए