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विपुल कुमार

1993 | गुड़गाँव, भारत

विपुल कुमार

ग़ज़ल 9

अशआर 20

इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए

और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए

हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले

कितने प्यारे हैं मुझे छोड़ के जाने वाले

उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो

उस दर्द पे ला'नत की जो अशआ'र में जाए

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इतना हैरान हो मेरी अना पर प्यारे

इश्क़ में भी कई ख़ुद्दार निकल आते हैं

मुझ से कब उस को मोहब्बत थी मगर मेरे बा'द

उस ने जिस शख़्स को चाहा वो मिरे जैसा था

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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