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नासिर काज़मी

1923 - 1972 | लाहौर, पाकिस्तान

आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के संस्थापकों में से एक। भारत के शहर अंबाला में पैदा हुए और पाकिस्तान चले गए जहाँ बटवारे के दुख दर्द उनकी शायरी का केंद्रीय विषय बन गए।

आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के संस्थापकों में से एक। भारत के शहर अंबाला में पैदा हुए और पाकिस्तान चले गए जहाँ बटवारे के दुख दर्द उनकी शायरी का केंद्रीय विषय बन गए।

ग़ज़ल 111

शेर 76

तनाब-ए-ख़ेमा-ए-गुल थाम 'नासिर'

कोई आँधी उफ़ुक़ से रही है

पहाड़ों से चली फिर कोई आँधी

उड़े जाते हैं औराक़-ए-ख़िज़ानी

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सारा दिन तपते सूरज की गर्मी में जलते रहे

ठंडी ठंडी हवा फिर चली सो रहो सो रहो

ई-पुस्तक 21

Atthara Sau Sattawan Khayal Number

 

2007

Barg-e-Nai

 

1990

Barg-e-Nai

 

1998

Deewan

 

1977

Deewan

 

1992

Deewan

 

1984

दीवान-ए-नासिर काज़मी

 

1981

Etibar-e-Naghma

 

1982

Ghair Matbua Kalam

 

1956

इंतिख़ाब-ए-नज़ीर

 

2003

वीडियो 56

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Gham hai ya khushi hai tu

नुसरत फ़तह अली ख़ान

Ishq jab zamzama pairaa hoga

इक़बाल बानो

Nazm "Pahli Barish" by Nasir Kazmi

ज़िया मोहीउद्दीन

Wo Is Ada Se Jo Aae to kyuun bhala

इक़बाल बानो

Wo to na mil sake hamen

मेहदी हसन

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो

हबीब वली मोहम्मद

अनूप जलोटा

अपनी धुन में रहता हूँ

ग़ुलाम अली

आज तो बे-सबब उदास है जी

अज्ञात

इश्क़ जब ज़मज़मा-पैरा होगा

इक़बाल बानो

कुछ तो एहसास-ए-ज़ियाँ था पहले

इक़बाल बानो

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे

आबिदा परवीन

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे

ज़ेहरा निगाह

कौन उस राह से गुज़रता है

पीनाज़ मसानी

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो

हबीब वली मोहम्मद

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो

ज़ेहरा निगाह

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो

ग़ुलाम अली

तू जब मेरे घर आया था

अज्ञात

तिरे आने का धोका सा रहा है

आबिदा परवीन

तिरे ख़याल से लो दे उठी है तन्हाई

इक़बाल बानो

तिरे मिलने को बेकल हो गए हैं

बिल्क़ीस ख़ानम

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

नूर जहाँ

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

विविध

दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया

ज़ेहरा निगाह

दिल धड़कने का सबब याद आया

नूर जहाँ

दिल धड़कने का सबब याद आया

फ़िरदौसी बेगम

दिल में इक लहर सी उठी है अभी

Tassawar Khanum

दिल में इक लहर सी उठी है अभी

आबिद अली बेग

दिल में और तो क्या रक्खा है

ग़ुलाम अली

नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए

खलील हैदर

निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं

नूर जहाँ

निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं

अज्ञात

निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं

ग़ुलाम अली

फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए

नय्यरा नूर

मैं ने जब लिखना सीखा था

सलामत अली

ये भी क्या शाम-ए-मुलाक़ात आई

पीनाज़ मसानी

याद आता है रोज़ ओ शब कोई

सयान चौधरी

वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए

ज़िया मोहीउद्दीन

शहर सुनसान है किधर जाएँ

आबिदा परवीन

दिल धड़कने का सबब याद आया

आशा भोसले

दिल धड़कने का सबब याद आया

पंकज उदास

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