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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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अफ़ज़ल इलाहाबादी

1984 | इलाहाबाद, भारत

अफ़ज़ल इलाहाबादी

ग़ज़ल 21

अशआर 15

मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँ

वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता

अभी तो उस का कोई तज़्किरा हुआ भी नहीं

अभी से बज़्म में ख़ुशबू का रक़्स जारी है

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तेरी निस्बत मिली मुझे जब से

मैं कोई आरज़ू नहीं करता

में इज़्तिराब के आलम में रक़्स करता रहा

कभी ग़ुबार की सूरत कभी धुआँ बन कर

अब तो हर एक अदाकार से डर लगता है

मुझ को दुश्मन से नहीं यार से डर लगता है

क़ितआ 27

पुस्तकें 1

 

चित्र शायरी 2

 

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