Ahmad Mushtaq's Photo'

अहमद मुश्ताक़

1933 | संयुक्त राज्य अमेरिका

पाकिस्तान के सबसे विख्यात और प्रतिष्ठित आधुनिक शायरों में से एक, अपनी नव-क्लासिकी लय के लिए प्रसिद्ध।

पाकिस्तान के सबसे विख्यात और प्रतिष्ठित आधुनिक शायरों में से एक, अपनी नव-क्लासिकी लय के लिए प्रसिद्ध।

ग़ज़ल 80

शेर 71

अहल-ए-हवस तो ख़ैर हवस में हुए ज़लील

वो भी हुए ख़राब, मोहब्बत जिन्हों ने की

एक लम्हे में बिखर जाता है ताना-बाना

और फिर उम्र गुज़र जाती है यकजाई में

अब उस की शक्ल भी मुश्किल से याद आती है

वो जिस के नाम से होते थे जुदा मिरे लब

ई-पुस्तक 4

अंधे लोग

 

2011

Gard-e-Mahtab

 

1981

Kulliyat

 

2003

Mehrab

 

1977

 

चित्र शायरी 18

आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना याद कर ऐ दिल-ए-ख़ामोश वो अपना रोना रक़्स करना कभी ख़्वाबों के शबिस्तानों में कभी यादों के सुतूनों से लिपटना रोना तुझ से सीखे कोई रोने का सलीक़ा ऐ अब्र कहीं क़तरा न गिराना कहीं दरिया रोना रस्म-ए-दुनिया भी वही राह-ए-तमन्ना भी वही वही मिल बैठ के हँसना वही तन्हा रोना ये तिरा तौर समझ में नहीं आया 'मुश्ताक़' कभी हँसते चले जाना कभी इतना रोना

कैसे उन्हें भुलाऊँ मोहब्बत जिन्हों ने की मुझ को तो वो भी याद हैं नफ़रत जिन्हों ने की दुनिया में एहतिराम के क़ाबिल वो लोग हैं ऐ ज़िल्लत-ए-वफ़ा तिरी इज़्ज़त जिन्हों ने की तज़ईन-ए-काएनात का बाइस वही बने दुनिया से इख़्तिलाफ़ की जुरअत जिन्हों ने की आसूदगान-ए-मंजि़ल-ए-लैला उदास हैं अच्छे रहे न तय ये मसाफ़त जिन्हों ने की अहल-ए-हवस तो ख़ैर हवस में हुए ज़लील वो भी हुए ख़राब, मोहब्बत जिन्हों ने की

शाम-ए-ग़म याद है कब शम्अ' जली याद नहीं कब वो रुख़्सत हुए कब रात ढली याद नहीं दिल से बहते हुए पानी की सदा गुज़री थी कब धुँदलका हुआ कब नाव चली याद नहीं ठंडे मौसम में पुकारा कोई हम आते हैं जिस में हम खेल रहे थे वो गली याद नहीं इन मज़ाफ़ात में छुप छुप के हवा चलती थी कैसे खिलती थी मोहब्बत की कली याद नहीं जिस्म-ओ-जाँ डूब गए ख़्वाब-ए-फ़रामोशी में अब कोई बात बुरी हो कि भली याद नहीं

वीडियो 3

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भारती विश्वनाथन

चाँद इस घर के दरीचों के बराबर आया

असद अमानत अली

मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है

अज्ञात

ऑडियो 38

अब मंज़िल-ए-सदा से सफ़र कर रहे हैं हम

अब वो गलियाँ वो मकाँ याद नहीं

अश्क दामन में भरे ख़्वाब कमर पर रक्खा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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