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Ain Tabish's Photo'

ऐन ताबिश

1958 | गया, भारत

प्रसिद्ध समकालीन शायर, अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

प्रसिद्ध समकालीन शायर, अपनी नज़्मों के लिए मशहूर

ऐन ताबिश के शेर

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है एक ही लम्हा जो कहीं वस्ल कहीं हिज्र

तकलीफ़ किसी के लिए आराम किसी का

है एक ही लम्हा जो कहीं वस्ल कहीं हिज्र

तकलीफ़ किसी के लिए आराम किसी का

जहाँ अपने अज़ीज़ों की दीद होती है

ज़मीन-ए-हिज्र पे भी कोई ईद होती है

जहाँ अपने अज़ीज़ों की दीद होती है

ज़मीन-ए-हिज्र पे भी कोई ईद होती है

जी लगा रक्खा है यूँ ताबीर के औहाम से

ज़िंदगी क्या है मियाँ बस एक घर ख़्वाबों का है

जी लगा रक्खा है यूँ ताबीर के औहाम से

ज़िंदगी क्या है मियाँ बस एक घर ख़्वाबों का है

बे-हुनर देख सकते थे मगर देखने आए

देख सकते थे मगर अहल-ए-हुनर देख पाए

बे-हुनर देख सकते थे मगर देखने आए

देख सकते थे मगर अहल-ए-हुनर देख पाए

रोज़ इक मर्ग का आलम भी गुज़रता है यहाँ

रोज़ जीने के भी सामान निकल आते हैं

रोज़ इक मर्ग का आलम भी गुज़रता है यहाँ

रोज़ जीने के भी सामान निकल आते हैं

इसी क़दर है हयात अजल के बीच का फ़र्क़

ये एक धूप का दरिया वो इक किनारा-ए-शाम

इसी क़दर है हयात अजल के बीच का फ़र्क़

ये एक धूप का दरिया वो इक किनारा-ए-शाम

एक ख़ुश्बू थी जो मल्बूस पे ताबिंदा थी

एक मौसम था मिरे सर पे जो तूफ़ानी था

एक ख़ुश्बू थी जो मल्बूस पे ताबिंदा थी

एक मौसम था मिरे सर पे जो तूफ़ानी था

एक बस्ती थी हुई वक़्त के अंदोह में गुम

चाहने वाले बहुत अपने पुराने थे उधर

एक बस्ती थी हुई वक़्त के अंदोह में गुम

चाहने वाले बहुत अपने पुराने थे उधर

इक ज़रा चैन भी लेते नहीं 'ताबिश'-साहब

मुल्क-ए-ग़म से नए फ़रमान निकल आते हैं

इक ज़रा चैन भी लेते नहीं 'ताबिश'-साहब

मुल्क-ए-ग़म से नए फ़रमान निकल आते हैं

आज भी उस के मिरे बीच है दुनिया हाइल

आज भी उस के मिरे बीच की मुश्किल है वही

आज भी उस के मिरे बीच है दुनिया हाइल

आज भी उस के मिरे बीच की मुश्किल है वही

मैं अपना कार-ए-वफ़ा आज़माऊँगा फिर भी

कहाँ मैं तेरे सितम याद करने वाला हूँ

मैं अपना कार-ए-वफ़ा आज़माऊँगा फिर भी

कहाँ मैं तेरे सितम याद करने वाला हूँ

तू जो इस दुनिया की ख़ातिर अपना-आप गँवाता है

दिल-ए-मन मेरे मुसाफ़िर काम है ये नादानों का

तू जो इस दुनिया की ख़ातिर अपना-आप गँवाता है

दिल-ए-मन मेरे मुसाफ़िर काम है ये नादानों का

हर ऐसे-वैसे से क़ुफ़्ल-ए-क़फ़स नहीं खुलता

इस इम्तिहाँ के लिए कुछ हक़ीर होते हैं

हर ऐसे-वैसे से क़ुफ़्ल-ए-क़फ़स नहीं खुलता

इस इम्तिहाँ के लिए कुछ हक़ीर होते हैं

मैं उस घड़ी अपने आप का सामना भी करने से भागता हूँ

वो ज़ीना ज़ीना उतरने वाली शबीह जब मुझ में जागती है

मैं उस घड़ी अपने आप का सामना भी करने से भागता हूँ

वो ज़ीना ज़ीना उतरने वाली शबीह जब मुझ में जागती है

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