अख़तर बस्तवी
ग़ज़ल 3
नज़्म 49
अशआर 3
आसाँ नहीं इंसाफ़ की ज़ंजीर हिलाना
दुनिया को जहाँगीर का दरबार न समझो
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आसाँ नहीं इंसाफ़ की ज़ंजीर हिलाना
दुनिया को जहाँगीर का दरबार न समझो
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बरसों से इस में फल नहीं आए तो क्या हुआ
साया तो अब भी सहन के कोहना शजर में है
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बरसों से इस में फल नहीं आए तो क्या हुआ
साया तो अब भी सहन के कोहना शजर में है
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कीजिए किस किस से आख़िर ना-शनासी का गिला
जब किसी ने भी निगाह-ए-मो'तबर डाली नहीं
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