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अख़्तर नज़्मी

1931 | ग्वालियर, भारत

ग़ज़ल 8

शेर 4

वो ज़हर देता तो सब की निगह में जाता

सो ये किया कि मुझे वक़्त पे दवाएँ दीं

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अब नहीं लौट के आने वाला

घर खुला छोड़ के जाने वाला

मिरी तरफ़ से तो टूटा नहीं कोई रिश्ता

किसी ने तोड़ दिया ए'तिबार टूट गया

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दोहा 9

आदत से लाचार है आदत नई अजीब

जिस दिन खाया पेट भर सोया नहीं ग़रीब

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भारी बोझ पहाड़ सा कुछ हल्का हो जाए

जब मेरी चिंता बढ़े माँ सपने में आए

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छेड़-छाड़ करता रहा मुझ से बहुत नसीब

मैं जीता तरकीब से हारा वही ग़रीब

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पुस्तकें 4

Khwabon Ka Hisab

 

1986

Meer Syed Ali Ghamgeen Dehlvi : Hayat, Shakhsiyat Aur Shairi

 

2008

Sawa Neze Pe Sooraj

 

1996

Shab Reze

 

1982

 

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