Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
Akhtar Razaa Saleemi's Photo'

अख़्तर रज़ा सलीमी

1974 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

अख़्तर रज़ा सलीमी के शेर

872
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

इक आग हमारी मुंतज़िर है

इक आग से हम निकल रहे हैं

आए अदम से एक झलक देखने तिरी

रक्खा ही क्या था वर्ना जहान-ए-ख़राब में

पहले तराशा काँच से उस ने मिरा वजूद

फिर शहर भर के हाथ में पत्थर थमा दिए

अब ज़मीं भी जगह नहीं देती

हम कभी आसमाँ पे रहते थे

गुज़र रहा हूँ किसी जन्नत-ए-जमाल से मैं

गुनाह करता हुआ नेकियाँ कमाता हुआ

तुझे ख़बर नहीं इस बात की अभी शायद

कि तेरा हो तो गया हूँ मगर मैं हूँ उस का

ख़्वाब गलियों में फिर रहे थे और

लोग अपने घरों में सोए थे

हम आए रोज़ नया ख़्वाब देखते हैं मगर

ये लोग वो नहीं जो ख़्वाब से बहल जाएँ

दिल निगाह पे तारी रहे फ़ुसूँ उस का

तुम्हारा हो के भी मुमकिन है मैं रहूँ उस का

सुना गया है यहाँ शहर बस रहा था कोई

कहा गया है यहाँ पर मकान होते थे

तुम्हारे होने का शायद सुराग़ पाने लगे

कनार-ए-चश्म कई ख़्वाब सर उठाने लगे

यहीं कहीं पे कोई शहर बस रहा था अभी

तलाश कीजिए इस का अगर निशाँ कोई है

जिस्मों से निकल रहे हैं साए

और रौशनी को निगल रहे हैं

Recitation

बोलिए