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अख्तर सईदी

1958

बिस्मिल सईदी के परिवार के शायर और पत्रकार, दैनिक ‘जिसारत’ और ‘जंग’ से सम्बद्ध रहे

बिस्मिल सईदी के परिवार के शायर और पत्रकार, दैनिक ‘जिसारत’ और ‘जंग’ से सम्बद्ध रहे

ग़ज़ल 5

 

शेर 6

मुझे हासिल कमाल-ए-गुफ़्तुगू है

ये मैं हूँ या मिरे लहजे में तू है

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कभी ख़याल की सूरत कभी सबा की तरह

वो कौन है जो मिरे साथ साथ चलता है

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जब तिश्नगी बढ़ी तो मसीहा था कोई

जब प्यास बुझ गई तो समुंदर मिला मुझे

रवाँ-दवाँ है ज़िंदगी चराग़ के बग़ैर भी

है मेरे घर में रौशनी चराग़ के बग़ैर भी

यही इक मश्ग़ला है ज़िंदगी का

तआ'क़ुब कर रहा हूँ रौशनी का

पुस्तकें 2

Charagh Jalne Tak

 

1989

ग़ालिब अपने आईने में

 

1970

 

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