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अली अकबर अब्बास

1948 | पाकिस्तान

अली अकबर अब्बास के शेर

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इक सदा की सूरत हम इस हवा में ज़िंदा हैं

हम जो रौशनी होते हम पे भी झपटती रात

इक सदा की सूरत हम इस हवा में ज़िंदा हैं

हम जो रौशनी होते हम पे भी झपटती रात

मैं अपने वक़्त में अपनी रिदा में रहता हूँ

और अपने ख़्वाब की आब-ओ-हवा में रहता हूँ

मैं अपने वक़्त में अपनी रिदा में रहता हूँ

और अपने ख़्वाब की आब-ओ-हवा में रहता हूँ

अपना आप नहीं है सब कुछ अपने आप से निकलो

बदबूएँ फैला देता है पानी का ठहराव

अपना आप नहीं है सब कुछ अपने आप से निकलो

बदबूएँ फैला देता है पानी का ठहराव

फ़रेब-ए-माह-ओ-अंजुम से निकल जाएँ तो अच्छा है

ज़रा सूरज ने करवट ली ये तारे डूब जाएँगे

फ़रेब-ए-माह-ओ-अंजुम से निकल जाएँ तो अच्छा है

ज़रा सूरज ने करवट ली ये तारे डूब जाएँगे

शाएर! तेरा दर्द बड़ा शाएर! तेरी सोच बड़ी

शाएर! तेरे सीने में इस जैसा लाख बहे दरिया

शाएर! तेरा दर्द बड़ा शाएर! तेरी सोच बड़ी

शाएर! तेरे सीने में इस जैसा लाख बहे दरिया

उसी पेड़ के नीचे दफ़्न भी होना होगा

जिस की जड़ पर मैं ने अपना नाम लिखा है

उसी पेड़ के नीचे दफ़्न भी होना होगा

जिस की जड़ पर मैं ने अपना नाम लिखा है

कभी सर पे चढ़े कभी सर से गुज़रे कभी पाँव आन गिरे दरिया

कभी मुझे बहा कर ले जाए कभी मुझ में आन बहे दरिया

कभी सर पे चढ़े कभी सर से गुज़रे कभी पाँव आन गिरे दरिया

कभी मुझे बहा कर ले जाए कभी मुझ में आन बहे दरिया

ज़रा हटे तो वो मेहवर से टूट कर ही रहे

हवा ने नोचा उन्हें यूँ कि बस बिखर ही रहे

ज़रा हटे तो वो मेहवर से टूट कर ही रहे

हवा ने नोचा उन्हें यूँ कि बस बिखर ही रहे

मैं भरी सड़कों पे भी बे-चाप चलने लग गया

घर में सोए लोग मेरे ज़ेहन पर यूँ छा गए

मैं भरी सड़कों पे भी बे-चाप चलने लग गया

घर में सोए लोग मेरे ज़ेहन पर यूँ छा गए

मैं खोए जाता हूँ तन्हाइयों की वुसअत में

दर-ए-ख़याल दर-ए-ला-मकाँ है या कुछ और

मैं खोए जाता हूँ तन्हाइयों की वुसअत में

दर-ए-ख़याल दर-ए-ला-मकाँ है या कुछ और

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