कभी मंदिर कभी मस्जिद पे है इस का बसेरा

धरम इंसानियत का बस कबूतर जानता है

देर तक साथ भीगे हम उस के

हम ने यूँ कामयाब की बारिश

यूँ तो सफ़र किया है कितने ही रास्तों पर

लेकिन तिरे ही घर का रस्ता पसंद आया

जब वफ़ा ही नहीं ज़माने में

इश्क़ सर पर सवार कौन करे

कभी मिलोगे ये सोच कर दिल

हज़ार सपने बुना करेगा