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अम्न लख़नवी

1898 - 1983 | लखनऊ, भारत

राष्ट्रीय एकता, धार्मिक एकता और जज़्बा-ए-आज़ादी को समर्पित शायरी के लिए मशहूर , स्वतंत्रता सेनानी

राष्ट्रीय एकता, धार्मिक एकता और जज़्बा-ए-आज़ादी को समर्पित शायरी के लिए मशहूर , स्वतंत्रता सेनानी

अम्न लख़नवी

ग़ज़ल 5

 

शेर 7

ज़िंदगी इक सवाल है जिस का जवाब मौत है

मौत भी इक सवाल है जिस का जवाब कुछ नहीं

कहानी अपनी अपनी अहल-ए-महफ़िल जब सुनाते हैं

मुझे भी याद इक भूला हुआ अफ़्साना आता है

ज़बान दहन से जो खुलते नहीं हैं

वो खुल जाते हैं राज़ अक्सर नज़र से

मुकम्मल दास्ताँ का इख़्तिसार इतना ही काफ़ी है

सुलाया शोर-ए-दुनिया ने जगाया शोर-ए-महशर ने

तुम्हारी बज़्म भी क्या बज़्म है आदाब हैं कैसे

वही मक़्बूल होता है जो गुस्ताख़ाना आता है

पुस्तकें 7

अपनी कहानी

 

1961

Barg-o-Bar

 

 

Churang

 

1963

Ishwar Allah Tere Naam

 

2003

कारवान-ओ-मंज़िल

 

1950

Nazr-e-Aqeedat

 

 

Sail-e-Aqeedat

 

1998

 

"लखनऊ" के और शायर

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