अंजुम फ़ारूक़
ग़ज़ल 14
अशआर 23
अब तिरा रस्ता जुदा मेरा जुदा
देख क़िस्मत का लिखा होते हुए
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साहबो मैं ने तराशे नहीं पत्थर के सनम
मेरे हाथों से बना और बना एक ही शख़्स
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जहाँ तक हो सके ख़ुद को बचा बदनाम होने से
मोहब्बत ख़त्म होती है मोहब्बत 'आम होने से
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बहुत अच्छा बहुत अच्छा बहुत अच्छा है तू लेकिन
तुझे कोई कहे अच्छा मुझे अच्छा नहीं लगता
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