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असर सहबाई

1901 - 1963

प्रसिद्ध शायर, रूमान और सामाजिक चेतना की नज़्में,ग़ज़लें और रुबाईयाँ कहीं

प्रसिद्ध शायर, रूमान और सामाजिक चेतना की नज़्में,ग़ज़लें और रुबाईयाँ कहीं

असर सहबाई

ग़ज़ल 5

 

शेर 9

ये हुस्न-ए-दिल-फ़रेब ये आलम शबाब का

गोया छलक रहा है पियाला शराब का

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तुम्हारी याद में दुनिया को हूँ भुलाए हुए

तुम्हारे दर्द को सीने से हूँ लगाए हुए

जिस हुस्न की है चश्म-ए-तमन्ना को जुस्तुजू

वो आफ़्ताब में है है माहताब में

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तेरे शबाब ने किया मुझ को जुनूँ से आश्ना

मेरे जुनूँ ने भर दिए रंग तिरी शबाब में

सारी दुनिया से बे-नियाज़ी है

वाह मस्त-ए-नाज़ क्या कहना

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पुस्तकें 8

Bam-e-Rifat

 

1954

जाम-ए-तहूर

 

 

Jaam-e-Tahoor

Rubaiyat-o- Qataat Ka Majmua

 

जाम-ए-तुहूर

 

 

Jam-e-Sahbai

 

 

Khamistan

 

 

khumistan

 

 

Rooh-e-Sahbai

 

1945