अतहर नादिर
ग़ज़ल 19
अशआर 22
देखो तो हर इक रंग से मिलता है मिरा रंग
सोचो तो हर इक बात है औरों से जुदा भी
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रात आँगन में चाँद उतरा था
तुम मिले थे कि ख़्वाब देखा था
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ग़म-गुसारी के लिए अब नहीं आता है कोई
ज़ख़्म भर जाने का इम्काँ न हुआ था सो हुआ
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हो गई शाम ढल गया सूरज
दिन को शब में बदल गया सूरज
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कोई नहीं है ऐसा कि अपना कहें जिसे
कैसा तिलिस्म टूटा है अपने गुमान का
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