Aziz Bano Darab Wafa's Photo'

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

1926 - 2005 | लखनऊ, भारत

लखनऊ की प्रतिष्ठित शायरा जिन्होंने अपनी अभिव्यक्ति में स्त्रीत्व को जगह दी

लखनऊ की प्रतिष्ठित शायरा जिन्होंने अपनी अभिव्यक्ति में स्त्रीत्व को जगह दी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ग़ज़ल 32

शेर 75

एक मुद्दत से ख़यालों में बसा है जो शख़्स

ग़ौर करते हैं तो उस का कोई चेहरा भी नहीं

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मेरे हालात ने यूँ कर दिया पत्थर मुझ को

देखने वालों ने देखा भी छू कर मुझ को

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चराग़ बन के जली थी मैं जिस की महफ़िल में

उसे रुला तो गया कम से कम धुआँ मेरा

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अहमियत का मुझे अपनी भी तो अंदाज़ा है

तुम गए वक़्त की मानिंद गँवा दो मुझ को

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हम ऐसे सूरमा हैं लड़ के जब हालात से पलटे

तो बढ़ के ज़िंदगी ने पेश कीं बैसाखियाँ हम को

पुस्तकें 1

Goonj

 

2009

 

चित्र शायरी 1

तमाम उम्र किसी और नाम से मुझ को पुकारता रहा इक अजनबी ज़बान में वो

 

ऑडियो 9

अपनी बीती हुई रंगीन जवानी देगा

अलावा इक चुभन के क्या है ख़ुद से राब्ता मेरा

एक दिए ने सदियों क्या क्या देखा है बतलाए कौन

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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