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बिस्मिल सईदी

1901 - 1976 | टोंक, भारत

क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख शायर / सीमाब अकबरकबादी के शागिर्द

क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख शायर / सीमाब अकबरकबादी के शागिर्द

बिस्मिल सईदी

ग़ज़ल 45

अशआर 19

हम ने काँटों को भी नरमी से छुआ है अक्सर

लोग बेदर्द हैं फूलों को मसल देते हैं

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सर जिस पे झुक जाए उसे दर नहीं कहते

हर दर पे जो झुक जाए उसे सर नहीं कहते

ठोकर किसी पत्थर से अगर खाई है मैं ने

मंज़िल का निशाँ भी उसी पत्थर से मिला है

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किया तबाह तो दिल्ली ने भी बहुत 'बिस्मिल'

मगर ख़ुदा की क़सम लखनऊ ने लूट लिया

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अधर उधर मिरी आँखें तुझे पुकारती हैं

मिरी निगाह नहीं है ज़बान है गोया

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पुस्तकें 11

चित्र शायरी 2

 

ऑडियो 8

अब इश्क़ रहा न वो जुनूँ है

इश्क़ जो ना-गहाँ नहीं होता

कब से उलझ रहे हैं दम-ए-वापसीं से हम

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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