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दत्तात्रिया कैफ़ी

1866 - 1955 | दिल्ली, भारत

अरबी, फ़ारसी और संस्कृत के प्रमुख स्कालर

अरबी, फ़ारसी और संस्कृत के प्रमुख स्कालर

ग़ज़ल 47

शेर 32

कोई दिल-लगी दिल लगाना नहीं है

क़यामत है ये दिल का आना नहीं है

दैर काबा में भटकते फिर रहे हैं रात दिन

ढूँढने से भी तो बंदों को ख़ुदा मिलता नहीं

इश्क़ ने जिस दिल पे क़ब्ज़ा कर लिया

फिर कहाँ उस में नशात ग़म रहे

वफ़ा पर दग़ा सुल्ह में दुश्मनी है

भलाई का हरगिज़ ज़माना नहीं है

उलझा ही रहने दो ज़ुल्फ़ों को सनम

जो खुल जाएँ भरम अच्छे हैं

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लेख 6

रेखाचित्र 1

 

पुस्तकें 23

अफ़सानचे

 

1944

Bharat Darpan

Musaddas-e-Kaifi

1905

Chand Nazmen

 

1954

Dariya-e-Latafat

 

1988

एक ज़िन्दगी एक सदी

 

1959

इंतिख़ाब-ए-ज़ौक़-ओ-ज़फर

 

1945

Jag Beeti

 

 

Jag Beeti

 

1993

Kaifiya

urdu zaban ki mukhtasar tareekh

1975

Kaifiya

urdu zaban ki mukhtasar tareekh

 

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